Ghazal Poetry (page 439)

इश्क़-आबाद फ़क़ीरों की अदा रखते हैं

नजीब अहमद

हम अपने घर से ब-रंग-ए-हवा निकलते हैं

नजीब अहमद

हर-चंद जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ

नजीब अहमद

इक वहम की सूरत सर-ए-दीवार-ए-यक़ीं हैं

नजीब अहमद

इक रंज-ए-उम्र दे के चला है किधर मुझे

नजीब अहमद

एक मेरी जाँ में और इक लहर सहराओं में थी

नजीब अहमद

दिल को हर गाम पे धड़के से लगे रहते हैं

नजीब अहमद

बदन से जाँ निकलना चाहती है

नजीब अहमद

अंधे बदन में ये सहर-आसार कौन है

नजीब अहमद

ऐ मह-ए-हिज्र क्या कहें किसी थकन सफ़र में थी

नजीब अहमद

आसमानों से ज़मीनों पे जवाब आएगा

नजीब अहमद

आसमाँ सूरज सितारे बहर-ओ-बर किस के लिए

नजीब अहमद

ये शाख़-ए-हुनर अपनी जो गुल-ए-रेज़ रही है

नईम सिद्दीक़ी

कुछ हुस्न-ए-वफ़ा के दीवाने फिर इश्क़ की राह में काम आए

नईम सिद्दीक़ी

जिस की तलब में उम्र का सौदा नहीं हुआ

नाहीद क़मर

ज़ब्त होंटों पे आ गया तो फिर

नाहीद विर्क

ये जो सुब्ह के बीच दीवार-ए-शब सी उठी लगती है

नाहीद विर्क

वो बिछड़ कर निढाल था ही नहीं

नाहीद विर्क

उस के हिसार-ए-ख़्वाब को मत कर्ब-ए-ज़ात कर

नाहीद विर्क

तेरी राह में रख कर अपनी शाम की आहट

नाहीद विर्क

माहताब-ए-वजूद पढ़ते हैं

नाहीद विर्क

कोई हिज्र है न विसाल है

नाहीद विर्क

कोई ऐसा कमाल हो जाए

नाहीद विर्क

जो तू मेरा मुक़द्दर बनते बनते रह गया है

नाहीद विर्क

गर दिल से भुलाई मिरी चाहत नहीं जाती

नाहीद विर्क

धूल ही धूल अड़ी है मुझ में

नाहीद विर्क

भरी रात में जागना पड़ गया है

नाहीद विर्क

अज़ाब-ए-हिज्र से अंजान थोड़ी होता है

नाहीद विर्क

अक्स भी अर्सा-ए-हैरान में रक्खा हुआ है

नाहीद विर्क

अभी से ताक़-ए-तलब पर न तू सजा मुझ को

नाहीद विर्क