Ghazal Poetry (page 437)
उठाने वाले ये इक बात है बताने की
नख़्शब जार्चवि
निगाह-ए-क़हर-परवर को भी तम्हीद-ए-ख़ुशी समझे
नख़्शब जार्चवि
नज़र को हामिल-ए-बर्क़-ए-जमाल कर न सका
नख़्शब जार्चवि
ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया में ला के देख लिया
नख़्शब जार्चवि
कभी तुम ने भी ये सोचा कि हम फ़रियाद क्या करते
नख़्शब जार्चवि
जुनून-ए-बे-ख़ुदी के साज़-ओ-सामाँ देखने वाले
नख़्शब जार्चवि
इमतियाज़-ए-हुस्न-ओ-उलफ़्त आश्कारा हो गया
नख़्शब जार्चवि
दिल मिरा ख़ूगर-ए-आलाम हुआ जाता है
नख़्शब जार्चवि
आप तो घबरा गए बेताबी-ए-दिल देख कर
नख़्शब जार्चवि
यक़ीं के बाद ये देखा कि फिर गुमाँ टूटे
नज्मुस्साक़िब
वही मोहतरम रहे शहर में जो तफ़ावुतों में लगे रहे
नज्मुस्साक़िब
तेरी सम्त जाने के रास्तों में ज़िंदा हूँ
नज्मुस्साक़िब
सोचों से इन ख़्वाबों की ज़ंजीरें कब उतरेंगी
नज्मुस्साक़िब
शब को आँखों में ठहरते कोई कब तक देखे
नज्मुस्साक़िब
समझ लिए भी जो हालात कुछ नहीं होगा
नज्मुस्साक़िब
कोई है जो ग़म नहीं झेलता किसे हर नफ़स में सुकून है
नज्मुस्साक़िब
किसी ख़मोशी का ज़हर जब इक मुकालमे की तरह से चुप था
नज्मुस्साक़िब
झील में बहते फूल कँवल के झूटे थे
नज्मुस्साक़िब
हुनूज़ रात है जलना पड़ेगा उस को भी
नज्मुस्साक़िब
बदन को जाँ से जुदा हो के ज़िंदा रहना है
नज्मुस्साक़िब
अना की क़ैद से निकले मुक़ाबला तो करे
नज्मुस्साक़िब
अच्छा सा इख़्तिताम भी तुम से न हो सका
नज्मुस्साक़िब
सज़ा से बच के कई बार शातिरों की तरह
नजमी सिद्दीक़ी
अजनबी शहर की अजनबी शाम में
नजमा शाहीन खोसा
वो जो महव थे सर-ए-आइना पस-ए-आइना भी तो देखते
नजमा ख़ान
मुस्कुराहटें सीखें क़हर की निगाहों से
नज्म आफ़न्दी
मोहब्बत की वो आहट पा न जाए
नज्म आफ़न्दी
ले लूँगा जान दे के मोहब्बत जहाँ मिले
नज्म आफ़न्दी
हस्ती कोई ऐसी भी है इंसाँ के सिवा और
नज्म आफ़न्दी
ज़िक्र हर सुब्ह ओ शाम है तेरा
नाजी शाकिर