Ghazal Poetry (page 436)

याद रखना एक दिन तेरी ज़बाँ तक आऊँगा

नक़्क़ाश आबिदी

तुम ने अब सीख लिया मुझ को सताए रखना

नक़्क़ाश आबिदी

तुम्हारा नाम ज़बाँ से निकल गया आख़िर

नक़्क़ाश आबिदी

तीर जब अपनी कमानों से निकल जाते हैं

नक़्क़ाश आबिदी

रूह मेरी अलग है जान अलग

नक़्क़ाश आबिदी

रहनुमाओं की बात करते हो

नक़्क़ाश आबिदी

हाथ ख़ाली सर-ए-बाज़ार लिए फिरती है

नक़्क़ाश आबिदी

हक़ जो माँगा तो मिरे हाथ में कश्कोल दिया

नक़्क़ाश आबिदी

हम-सफ़र याद हैं उस के जो सफ़र ख़त्म हुआ

नक़्क़ाश आबिदी

अब तो रूठ जाने का वक़्त ही नहीं मिलता

नक़्क़ाश आबिदी

आओ जो टूटे हुए ख़्वाब हैं तक़्सीम करें

नक़्क़ाश आबिदी

ये बज़्म-ए-शब है यहाँ इल्म-ओ-आगही कम है

नामी अंसारी

सोहबत-ए-शब का तलबगार न होगा कोई

नामी अंसारी

रंग-ए-वहशत कम नहीं ज़ख़्म-ए-तमाशा कम नहीं

नामी अंसारी

नज़र मिली थी किसी बे-ख़बर से पहले भी

नामी अंसारी

मुझे कल मिला जो सर-ए-चमन वो तमाम नख़्ल-ए-शबाब सा

नामी अंसारी

मिरे ख़याल से आगे तिरा निशाना पड़ा

नामी अंसारी

मौज-ए-गुल बर्ग-ए-हिना आब-ए-रवाँ कुछ भी नहीं

नामी अंसारी

ख़ुद आज़मा के भी दा'वे अजल के देखते हैं

नामी अंसारी

ख़ाक-ए-अग़्यार से यारब मुझे पैवंद न कर

नामी अंसारी

जहाँ पे डूब गया था कभी सितारा मिरा

नामी अंसारी

हवा-ए-तुंद के आगे धुआँ ठहरता नहीं

नामी अंसारी

हर शय वही नहीं है जो परछाइयों में है

नामी अंसारी

गीत मेरे हैं मगर नूर-ए-सुख़न उस का है

नामी अंसारी

घर छोड़ा बे-सम्त हुए हैरानी में

नामी अंसारी

इक निगाह-ए-दिलबरी मेरी तरफ़

नामी अंसारी

ऐ आबला-पा और भी रफ़्तार ज़रा तेज़

नामी अंसारी

वो कौन है जो हलाक-ए-निगाह-ए-नाज़ नहीं

नख़्शब जार्चवि

वो कौन है जो हलाक-ए-निगाह-ए-नाज़ नहीं

नख़्शब जार्चवि

वा'दे का ए'तिबार तो है वाक़ई मुझे

नख़्शब जार्चवि