Ghazal Poetry (page 489)

इस क़दर सच्चाई से बेज़ार दुनिया हो गई

मुजाहिद फ़राज़

दावे बुलंदियों के करें किस ज़बाँ से हम

मुजाहिद फ़राज़

बीच समुंदर रहता हूँ

मुजाहिद फ़राज़

बदन की क़ैद से बाहर ठिकाना चाहता है

मुजाहिद फ़राज़

मोहब्बत मिरी रंग लाने लगी है

मुहीउद्दीन इरफ़ान

हुस्न की बर्क़-बारियाँ तौबा

मुहीउद्दीन इरफ़ान

ऐ मिरे दिल की रौशनी तो यूँही जगमगाए जा

मुहीउद्दीन इरफ़ान

सर्द आज-कल इस दर्जा ज़माने की हवा है

मुहीउद्दीन फ़ौक़

दामन क़रार-ए-दिल के सब तार तार देखे

मुहीउद्दीन फ़ौक़

साफ़-गोई रास्ती अच्छी लगी

मुहिब कौसर

जहान-ए-ताज़ा के अफ़्कार साथ ले जाओ

मुहिब कौसर

ग़मों की धूप कड़ी दोपहर से गुज़रे हैं

मुहिब कौसर

उस को पा जाऊँ कभी ऐसा मुक़द्दर है कहाँ

मुहिब आरफ़ी

उम्र भर जिस पे तकिया रहा कुछ न था दिल नहीं मानता

मुहिब आरफ़ी

शोला-ए-शौक़ की आग़ोश में क्यूँकर आऊँ

मुहिब आरफ़ी

साया जिस का नज़र आता है मुझे

मुहिब आरफ़ी

नक़्क़ाद अपने आप का बे-लाग ऐसा कौन है

मुहिब आरफ़ी

मुझ को तलब तो नई दुनिया की है

मुहिब आरफ़ी

महरूमियों का इक सबब जोश-ए-तलब ख़ुद भी तो है

मुहिब आरफ़ी

कुछ न होने की हक़ीक़त नहीं जानी यानी

मुहिब आरफ़ी

ख़िरद यक़ीं के सुकूँ-ज़ार की तलाश में है

मुहिब आरफ़ी

ख़याल-ए-ज़ेहन-शिकन से ज़बान भर आ जाए

मुहिब आरफ़ी

कैसे कैसे मिले दिन को साए हमें

मुहिब आरफ़ी

जो ज़ख़्मों से अपने बहलते रहेंगे

मुहिब आरफ़ी

इक लहर सी देखी गई पाए न गए हम

मुहिब आरफ़ी

बे-तही यही होगी ये जहाँ कहीं होंगे

मुहिब आरफ़ी

अपनी आग में भुनती जाए बुनती जाए कफ़न अपना

मुहिब आरफ़ी

अंदर तो ख़यालों के हो आए ख़याल अपना

मुहिब आरफ़ी

अब यहाँ कोई नहीं पहले यहाँ था कोई

मुहिब आरफ़ी

वो नमाज़-ए-इश्क़ ही क्या जो सलाम तक न पहुँचे

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी