Ghazal Poetry (page 487)
मौत को ज़ीस्त तरसती है यहाँ
मुख़्तार सिद्दीक़ी
की शब-ए-हश्र मिरी शाम-ए-जवानी तुम ने
मुख़्तार सिद्दीक़ी
ध्यान की मौज को फिर आइना-सीमा कर लें
मुख़्तार सिद्दीक़ी
बस्तियाँ कैसे न मम्नून हों दीवानों की
मुख़्तार सिद्दीक़ी
आख़िर दिल की पुरानी लगन कर के ही रहेगी फ़क़ीर हमें
मुख़्तार सिद्दीक़ी
वक़्त के चेहरे पे चढ़ती धूप का ग़ाज़ा लगा
मुख़तार शमीम
सुख़न सुख़न जो किसी कर्ब से इबारत था
मुख़तार शमीम
सुब्ह रंगीन-ओ-जवाँ शाम सुहानी माँगे
मुख़तार शमीम
पास अपने बोरिया बिस्तर न था
मुख़तार शमीम
नामा-ए-गुल में किसी शोख़ की तहरीर का रंग
मुख़तार शमीम
मैं ज़िंदगी के हज़ारों अज़ाब झेल गया
मुख़तार शमीम
लफ़्ज़ों में कैसा रंग-ए-मआ'नी दिखाई दे
मुख़तार शमीम
ख़ुद अपने आप को धोका दिया है
मुख़तार शमीम
ख़यालों में भी अक्सर चौंक उठा हूँ
मुख़तार शमीम
ख़ामोशियों के गहरे समुंदर में डूब जाएँ
मुख़तार शमीम
कभी साया तो कभी धूप का मंज़र बदले
मुख़तार शमीम
है तक़ाज़ा-ए-जुनूँ सिलसिला-वार मिले
मुख़तार शमीम
फ़रेब-ए-हुस्न नज़र का दिखाई देता है
मुख़तार शमीम
दिल लरज़ रहा है क्यूँ इस के ख़त को पा कर भी
मुख़तार शमीम
तीर ओ कमान, ख़ंजर ओ तलवार बन गए
मुख़तार जावेद
कुछ तो मौक़ूफ़ निगाहों की चमक पर होगा
मुख़तार जावेद
ख़ुदा की ज़ात ने जब दर्द का नुज़ूल किया
मुख़तार जावेद
हदफ़ हूँ दुश्मन-ए-जाँ की नज़र में रहता हूँ
मुख़तार जावेद
अब्र बे-वज्ह नहीं दश्त के ऊपर आए
मुख़तार जावेद
शब-ए-ग़म मुख़्तसर सी हो गई है
मुख़्तार हाशमी
सराब-ए-ज़ीस्त में सिमटा हुआ हूँ
मुख़्तार हाशमी
साहिब-ए-ताज-ए-बसीरत हूँ मैं दीवाना सही
मुख़्तार हाशमी
नज़र-नवाज़ है हुस्न-ए-ख़जिस्ता-पय अब भी
मुख़्तार हाशमी
मुजरिम-ए-इश्क़ तलबगार-ए-मुआ'फ़ी तो नहीं
मुख़्तार हाशमी
मिरा सोज़ भी तरन्नुम मिरी आह भी तराना
मुख़्तार हाशमी