Ghazal Poetry (page 486)
उस की आँखों पे मान था ही नहीं
मुमताज़ गुर्मानी
क़लम की नोक पे रक्खूँगा इस जहान को मैं
मुमताज़ गुर्मानी
नींदों को जब ख़्वाब में जूता जाता था
मुमताज़ गुर्मानी
मेले में गर नज़र न आता रूप किसी मतवाली का
मुमताज़ गुर्मानी
मैं कम-सिनी के सभी खिलौनों में यूँ बिखरता जवाँ हुआ था
मुमताज़ गुर्मानी
हुस्न फ़ानी है जवानी के फ़साने तक है
मुमताज़ गुर्मानी
हम कहाँ अज़्मत अस्लाफ़ सँभाले हुए हैं
मुमताज़ गुर्मानी
गुल-बदन ख़ाक-नशीनों से परे हट जाएँ
मुमताज़ गुर्मानी
फ़सील-ए-दिल में दर किया कि राब्ता बना रहे
मुमताज़ गुर्मानी
अपनी हर बात ज़माने से छुपानी पड़ी थी
मुमताज़ गुर्मानी
तुम से जब बिछड़े तो कितने राब्ते रक्खे गए
मुमताज़ अतहर
मुझे शक्ल दे के तमाम कर कफ़-ए-कूज़ा-गर
मुमताज़ अतहर
कहीं भी शहर में कुंज-ए-अमाँ नहीं मिलता
मुमताज़ अतहर
नज़्र-ए-तौबा हम करेंगे मय-परस्ती एक दिन
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
ना वो मसर्रत गुनाह में है न वो कशिश अब सवाब में है
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
मिरी ज़िंदगी का ये हाल था यही शक्ल-ए-राह-रवी रही
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
किसी की याद को अपना शिआ'र कर लेंगे
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
कहाँ सदमा नहीं होते कहाँ मातम नहीं होता
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
जुनून-ए-इश्क़ की ये फ़ित्ना-सामानी नहीं जाती
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
जो मेरी हालत पे हंस रहे हैं मुझे कुछ उन से गिला नहीं है
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
दुनिया वही है और वही सामान-ए-ज़िंदगी
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
दिल-ए-ना-सुबूर को फिर वही बुत-ए-बेवफ़ा की तलाश है
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
बज़्म-ए-नशात-ओ-ऐश का सामाँ लिए हुए
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
वही इक पुकार वही फ़ुग़ाँ मिरी मोहर-ए-दीदा-ओ-लब में है
मुख़्तार सिद्दीक़ी
थी तो सही पर आज से पहले ऐसी हक़ीर फ़क़ीर न थी
मुख़्तार सिद्दीक़ी
तिरे जल्वे तेरे हिजाब को मेरी हैरतों से नुमू मिली
मुख़्तार सिद्दीक़ी
शोख़ थे रंग हर इक दौर में अफ़्सानों के
मुख़्तार सिद्दीक़ी
रात के बाद वो सुब्ह कहाँ है दिन के बाद वो शाम कहाँ
मुख़्तार सिद्दीक़ी
फिर बहार आई है फिर जोश में सौदा होगा
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नूर-ए-सहर कहाँ है अगर शाम-ए-ग़म गई
मुख़्तार सिद्दीक़ी