Ghazal Poetry (page 488)

ख़ुद-पसंदाना तक़ाज़ों पर अगर जाएगी

मुख़्तार हाशमी

ख़याल-ए-मर्ग बड़ी शय है ज़िंदगी के लिए

मुख़्तार हाशमी

कभी किसी को न अहद-ए-वफ़ा का पास हुआ

मुख़्तार हाशमी

हुस्न-ए-नज़्ज़ारा सही जल्वा-दर-आग़ोश सही

मुख़्तार हाशमी

गुरेज़ाँ रंग-ओ-बू से दिल नहीं है

मुख़्तार हाशमी

ग़म-ए-जानाँ में समो कर ग़म-ए-दौराँ हम ने

मुख़्तार हाशमी

अमीन-ए-ग़ैरत-ए-उल्फ़त जो ज़िंदगी होगी

मुख़्तार हाशमी

बुलंद बर्क़ के आगे भी हौसला रखना

मुख़्तार अहमद कौसर

इंकार किसे, औज-ए-क़मर तक नहीं पहुँचा

मुख़लिस वजदानी

दिखा न दस्त-शनासों को हाथ, फ़ाल न पूछ

मुख़लिस वजदानी

सामने मेरे है दुनिया ज्यूँ समुंदर रेत का

मुकेश आलम

रफ़्ता रफ़्ता होश मुझ को इस क़दर आ जाएगा

मुकेश आलम

हैं ये रिंद-ओ-साक़ी हिसाब में

मुकेश आलम

ग़म-ए-फ़िराक़ भी आख़िर फ़रोग़ पा ही गया

मुकेश आलम

हक़ मेरी मोहब्बत का अदा क्यूँ नहीं करते

मुजीब ज़फ़र अनवार हमीदी

यही नहीं कि बस ग़म-ए-सफ़र हमारे साथ है

मुजीब ख़ैराबादी

सूरज की सुनहरी किरनों से ताबिंदा रुख़-ए-आलम न सही

मुजीब ख़ैराबादी

मिस्ल-ए-अब्र-ए-करम हम जहाँ भी गए दश्त के दश्त गुलज़ार बनते गए

मुजीब ख़ैराबादी

मिरे साथियो मिरे हमदमो ये बजा कि तेज़-ख़िराम हूँ

मुजीब ख़ैराबादी

मेरा जुनूँ शर्मसार देखिए कब तक रहे

मुजीब ख़ैराबादी

कितने ख़्वाब टूटे हैं कितने चाँद गहनाए

मुजीब ख़ैराबादी

हम अहल-ए-अज़्म अगर दिल से जुस्तुजू करते

मुजीब ख़ैराबादी

अपनों का ये आलम क्या कहिए मिलते हैं तो बेगानों की तरह

मुजीब ख़ैराबादी

इरफ़ान की फ़ज़ा में फ़र्ज़ानगी से दामन

मुजीब ईमान

अफ़्कार के जिगर में रक़्साँ रफ़ू की ख़्वाहिश

मुजीब ईमान

वो आज़माएँ मुझे उन को आज़माऊँ मैं

मुजाहिद फ़राज़

उम्र गुज़री इसी मैदान को सर करने में

मुजाहिद फ़राज़

सिलसिला लफ़्ज़ों की सौग़ात का भी टूट गया

मुजाहिद फ़राज़

पता चला कि मिरी ज़िंदगी में लिक्खा था

मुजाहिद फ़राज़

मशक़्क़त की तपिश में जिस्म का लोहा गलाते हैं

मुजाहिद फ़राज़