Ghazal Poetry (page 490)

वो नाम ज़हर का रख दें दवा तो क्या होगा

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

निगाह-ए-फ़ितरत में दर-हक़ीक़त वो ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं है

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

जुनूँ में मश्क़-ए-तसव्वुर बढ़ा रहा हूँ मैं

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

हम हिज्र की काली रातों में जब बिस्तर-ए-ख़्वाब पे जाते हैं

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

फ़ैज़ान-ए-मोहब्बत न हुआ आम अभी तक

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

इक इंक़लाब-ए-मुसलसल है ज़िंदगी मेरी

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

दूर रह कर वतन की फ़ज़ा से जब भी अहबाब की याद आई

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

अजब बे-कैफ़ है रातों की तन्हाई कई दिन से

मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी

यूँ लगता है सब कुछ खोने आया था

मुग़नी तबस्सुम

यहाँ से डूब कर जाना है मुझ को

मुग़नी तबस्सुम

तपते सहरा में ये ख़ुशबू साथ कहाँ से आई

मुग़नी तबस्सुम

सुब्हें कैसी आग लगाने वाली थीं

मुग़नी तबस्सुम

रंज-ए-गिरान-ए-शौक़ का हासिल न कह इसे

मुग़नी तबस्सुम

निगाहों से निकल कर जो गए हैं

मुग़नी तबस्सुम

नाम ही रह गया इक अंजुमन-आराई का

मुग़नी तबस्सुम

मैं एक अंधे कुएँ का क़ैदी किसे मिलूँगा

मुग़नी तबस्सुम

क्या कोई दर्द दिल के मुक़ाबिल नहीं रहा

मुग़नी तबस्सुम

गिरना नहीं है और सँभलना नहीं है अब

मुग़नी तबस्सुम

फ़ज़ा में नग़्मा-ए-आवाज़-ए-पा है मेरे लिए

मुग़नी तबस्सुम

दिल की लगी रह जाएगी

मुग़नी तबस्सुम

छुपा रक्खा था यूँ ख़ुद को कमाल मेरा था

मुग़नी तबस्सुम

अज़ाब हो गई ज़ंजीर-ए-दस्त-ओ-पा मुझ को

मुग़नी तबस्सुम

वही दरीचा-ए-जाँ है वही गली यारो

मुग़ल फ़ारूक़ परवाज़

ये कह के रख़्ना डालिए उन के हिजाब में

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

निकलना हो दिल से दुश्वार क्यूँ

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

नालों से मेरे कब तह-ओ-बाला जहाँ नहीं

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

नालों से मेरे कब तह-ओ-बाला जहाँ नहीं

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

क्या जानो जो असर है दम-ए-शो'ला-ताब में

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

काश मक़्बूल हो दुआ-ए-अदू

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

इक बात पर बिगड़े गए न जो उम्र-भर मिले

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा