Ghazal Poetry (page 491)

अगर हम न थे ग़म उठाने के क़ाबिल

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

ज़मीं बिछा के अलग आसमाँ बनाऊँ कोई

मुबीन मिर्ज़ा

ये मोहब्बत है इसे गर्मी-ए-बाज़ार न कर

मुबीन मिर्ज़ा

यही तो दुख है ज़मीं आसमाँ बना कर भी

मुबीन मिर्ज़ा

तिरी बज़्म से जो उठ कर तिरे जाँ-निसार आए

मुबीन मिर्ज़ा

तिरा ग़म दिल पे इफ़्शा कर रहे हैं

मुबीन मिर्ज़ा

साथियो जो अहद बाँधा है उसे तोड़ा न जाए

मुबीन मिर्ज़ा

क़रीने ज़ीस्त में थे सोख़्ता-जानी से पहले

मुबीन मिर्ज़ा

न आह करते हुए और न वाह करते हुए

मुबीन मिर्ज़ा

मुझे जिस ने मेरा पता दिया वो ग़म-ए-निहाँ मिरे साथ है

मुबीन मिर्ज़ा

मैं दिन भर पहले इस दुनिया की जौलानी में रहता हूँ

मुबीन मिर्ज़ा

कुछ दर्द जगाए रखते हैं कुछ ख़्वाब सजाए रखते हैं

मुबीन मिर्ज़ा

ख़ुशी से ज़ीस्त का हर दुख उठाए जाते हैं

मुबीन मिर्ज़ा

कभी ख़ुदा कभी ख़ुद से सवाल करते हुए

मुबीन मिर्ज़ा

जला दिया है कि इस ने बुझा दिया है मुझे

मुबीन मिर्ज़ा

जानता हूँ अब यूँही बरबाद रक्खेगा मुझे

मुबीन मिर्ज़ा

हर घड़ी इक सितम ईजाद किया है हम ने

मुबीन मिर्ज़ा

ग़ुबार-ए-राह-ए-तिलिस्म-ए-ज़माना हो गए हैं

मुबीन मिर्ज़ा

इक नक़्श बिगड़ने से इक हद के गुज़रने से

मुबीन मिर्ज़ा

इक ख़्वाब को आँखें रेहन रखें इक शौक़ में दिल वीरान किया

मुबीन मिर्ज़ा

दिन रात के देखे हुए मंज़र से अलग है

मुबीन मिर्ज़ा

चले जाएँगे सब अस्बाब हैरानी न जाएगी

मुबीन मिर्ज़ा

बड़े तूफ़ाँ उठाने के लिए हैं

मुबीन मिर्ज़ा

सज्दा-ए-याद में सर अपना झुकाया हुआ है

मुबश्शिर सईद

पहले वो अचानक नज़र आया उसे देखा

मुबश्शिर सईद

मैं तो बैठा था हर इक शय से किनारा कर के

मुबश्शिर सईद

ख़्वाब-ज़दा वीरानों तक

मुबश्शिर सईद

ख़्वाब सुनने से गए इश्क़ बताने से गए

मुबश्शिर सईद

कब मिरी हल्क़ा-ए-वहशत से रिहाई हुई है

मुबश्शिर सईद

इश्क़ करता कि तिरे हिज्र से नफ़रत करता

मुबश्शिर सईद