Ghazal Poetry (page 493)
जो पाँच वक़्त मुसल्ले पे क़िबला-रू निकले
मुबारक अज़ीमाबादी
जो निगाह-ए-नाज़ का बिस्मिल नहीं
मुबारक अज़ीमाबादी
जबीं पर ख़ाक है ये किस के दर की
मुबारक अज़ीमाबादी
इश्क़ की चौसर किस ने खेली ये तो खेल हमारे हैं
मुबारक अज़ीमाबादी
इसे सौदा उसे सौदा ये दीवाना वो दीवाना
मुबारक अज़ीमाबादी
घटा उट्ठी है काली और काली होती जाती है
मुबारक अज़ीमाबादी
देखे उसे हर आँख का ये काम नहीं है
मुबारक अज़ीमाबादी
दर्द-ए-दिल यार रहा दर्द से यारी न गई
मुबारक अज़ीमाबादी
चितवन जो क़हर की है तो तेवर जलाल के
मुबारक अज़ीमाबादी
बिखरी हुई है यूँ मिरी वहशत की दास्ताँ
मुबारक अज़ीमाबादी
बेगाना-ए-वफ़ा तिरा शेवा ही और है
मुबारक अज़ीमाबादी
बग़ल में हम ने रात इक ग़ैरत-ए-महताब देखा है
मुबारक अज़ीमाबादी
बद-ज़न हैं अहल-ए-काबा मुझ दैर-आश्ना से
मुबारक अज़ीमाबादी
अजब रंग की मय-परस्ती रही
मुबारक अज़ीमाबादी
अब कौन बात रह गई ये बात भी गई
मुबारक अज़ीमाबादी
आब-ओ-दाना तिरा ऐ बुलबुल-ए-ज़ार उठता है
मुबारक अज़ीमाबादी
ज़मीन-ए-फ़िक्र में लफ़्ज़ों के जंगल छोड़ जाना
मुबारक अंसारी
ये दोस्ती का तक़ाज़ा है इस को ध्यान में रख
मुबारक अंसारी
उसी के प्यार को दिल से निकाल रक्खा है
मुबारक अंसारी
फिसलने वाला था ख़ुद को मगर सँभाल गया
मुबारक अंसारी
नफ़स नफ़स को हवा की रिकाब में रखना
मुबारक अंसारी
कुछ अब के जंग पे उस की गिरफ़्त ऐसी थी
मुबारक अंसारी
खींच कर मुझ को हर इक नक़्श-ओ-निशाँ ले जाए
मुबारक अंसारी
हम तिरे शहर से यूँ जान-ए-वफ़ा लौट आए
मुबारक अंसारी
गुमाँ की क़ैद-ए-हिसार-ए-क़यास से निकलो
मुबारक अंसारी
उन से इक़रार-ए-वफ़ा की आरज़ू करते रहे
मूसा रज़ा
तुम्हारी बज़्म में महरूम-ए-जाम हम भी थे
मूसा रज़ा
तुम मेरे साथ भी जुदा भी हो
मूसा रज़ा
पूछते हो मिरे अशआ'र में क्या रक्खा है
मूसा रज़ा
न वो हिज्र में रहीं तल्ख़ियाँ न वो लज़्ज़तें हैं विसाल में
मूसा रज़ा