Ghazal Poetry (page 495)
वादे की जो साअत दम-ए-कुश्तन है हमारा
मोमिन ख़ाँ मोमिन
वादा-ए-वस्लत से दिल हो शाद क्या
मोमिन ख़ाँ मोमिन
उल्टे वो शिकवे करते हैं और किस अदा के साथ
मोमिन ख़ाँ मोमिन
तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब
मोमिन ख़ाँ मोमिन
थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
मोमिन ख़ाँ मोमिन
तासीर सब्र में न असर इज़्तिराब में
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ता न पड़े ख़लल कहीं आप के ख़्वाब-ए-नाज़ में
मोमिन ख़ाँ मोमिन
शोख़ कहता है बे-हया जाना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
शब तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गए
मोमिन ख़ाँ मोमिन
सौदा था बला-ए-जोश पर रात
मोमिन ख़ाँ मोमिन
सब्र वहशत-असर न हो जाए
मोमिन ख़ाँ मोमिन
रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
मोमिन ख़ाँ मोमिन
राज़-ए-निहाँ ज़बान-ए-अग़्यार तक न पहुँचा
मोमिन ख़ाँ मोमिन
क़हर है मौत है क़ज़ा है इश्क़
मोमिन ख़ाँ मोमिन
न इंतिज़ार में याँ आँख एक आन लगी
मोमिन ख़ाँ मोमिन
'मोमिन' ख़ुदा के वास्ते ऐसा मकाँ न छोड़
मोमिन ख़ाँ मोमिन
मैं अगर आप से जाऊँ तो क़रार आ जाए
मोमिन ख़ाँ मोमिन
महशर में पास क्यूँ दम-ए-फ़रियाद आ गया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
करता है क़त्ल-ए-आम वो अग़्यार के लिए
मोमिन ख़ाँ मोमिन
जूँ निकहत-ए-गुल जुम्बिश है जी का निकल जाना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
जो तेरे मुँह से न हो शर्मसार आईना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद ओ याद-ए-शराब में
मोमिन ख़ाँ मोमिन
इस वुसअत-ए-कलाम से जी तंग आ गया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
इम्तिहाँ के लिए जफ़ा कब तक
मोमिन ख़ाँ मोमिन
हम समझते हैं आज़माने को
मोमिन ख़ाँ मोमिन
हुई तासीर आह-ओ-ज़ारी की
मोमिन ख़ाँ मोमिन
हो न बेताब अदा तुम्हारी आज
मोमिन ख़ाँ मोमिन
हम-रंग लाग़री से हूँ गुल की शमीम का
मोमिन ख़ाँ मोमिन
है दिल में ग़ुबार उस के घर अपना न करेंगे
मोमिन ख़ाँ मोमिन