Ghazal Poetry (page 497)

मिले मुझ को ग़म से फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना

मुईन अहसन जज़्बी

मरने की दुआएँ क्यूँ माँगूँ जीने की तमन्ना कौन करे

मुईन अहसन जज़्बी

कूचा-ए-यार में अब जाने गुज़र हो कि न हो

मुईन अहसन जज़्बी

कितनी बुलंदियों पे सर-ए-दार आए हैं

मुईन अहसन जज़्बी

कितनी बुलंदियों पे सर-ए-दार आए हैं

मुईन अहसन जज़्बी

जब कभी किसी गुल पर इक ज़रा निखार आया

मुईन अहसन जज़्बी

इस बुत के हर फ़रेब पे क़ुर्बान से रहे

मुईन अहसन जज़्बी

इंतिहा-ए-ग़म में मुझ को मुस्कुराना आ गया

मुईन अहसन जज़्बी

हम एक ख़्वाब लिए माह ओ साल से गुज़रे

मुईन अहसन जज़्बी

हम दहर के इस वीराने में जो कुछ भी नज़ारा करते हैं

मुईन अहसन जज़्बी

ग़मों की दुनिया को रौंद डालें नशात-ए-दिल पाएमाल कर लें

मुईन अहसन जज़्बी

ग़म की तस्वीर बन गया हूँ मैं

मुईन अहसन जज़्बी

फ़ुज़ूल राज़ मोहब्बत का सब छुपाते हैं

मुईन अहसन जज़्बी

फ़ज़ा-ए-शब में सितारे हज़ार गुज़रे हैं

मुईन अहसन जज़्बी

दिल सर्द हो तो वा लब-ए-गुफ़्तार क्या करें

मुईन अहसन जज़्बी

दिल में कुछ सोज़-ए-तमन्ना के निशाँ मिलते हैं

मुईन अहसन जज़्बी

दाना-ए-ग़म न महरम-ए-राज़-ए-हयात हम

मुईन अहसन जज़्बी

दाग़-ए-ग़म दिल से किसी तरह मिटाया न गया

मुईन अहसन जज़्बी

चमन में थे जो चमन ही की दास्तान सुनते

मुईन अहसन जज़्बी

बीते हुए दिनों की हलावत कहाँ से लाएँ

मुईन अहसन जज़्बी

अपनी निगाह-ए-शौक़ को रुस्वा करेंगे हम

मुईन अहसन जज़्बी

ऐश से क्यूँ ख़ुश हुए क्यूँ ग़म से घबराया किए

मुईन अहसन जज़्बी

ऐ ग़ैरत-ए-ग़म आँख मिरी नम तो नहीं है

मुईन अहसन जज़्बी

आह भी इक कोशिश-ए-नाकाम है मेरे लिए

मुईन अहसन जज़्बी

ये मोजज़ा है कि मैं रात काट देता हूँ

मुईद रशीदी

ये हिजरतों के तमाशे, ये क़र्ज़ रिश्तों के

मुईद रशीदी

वो जब भी पुकारेगा यहाँ आन रहेंगे

मुईद रशीदी

मकाँ से दूर कहीं ला-मकाँ में बैठ गई

मुईद रशीदी

मैं कोई दश्त मैं दीवार नहीं कर सकता

मुईद रशीदी

लगता है तबाही मिरी क़िस्मत से लगी है

मुईद रशीदी