Ghazal Poetry (page 499)

दीवार अब कहीं न कोई दर दिखाई दे

मोहसिन ज़ैदी

अगर चमन का कोई दर खुला भी मेरे लिए

मोहसिन ज़ैदी

आगही कब यहाँ पलकों पे सही जाती है

मोहसिन शकील

वलवले जितने सफ़र के थे सफ़र इतने न थे

मोहसिन शैख़

ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी

मोहसिन नक़वी

ज़ख़्म के फूल से तस्कीन तलब करती है

मोहसिन नक़वी

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ

मोहसिन नक़वी

ये कह गए हैं मुसाफ़िर लुटे घरों वाले

मोहसिन नक़वी

ये दिल ये पागल दिल मिरा क्यूँ बुझ गया आवारगी

मोहसिन नक़वी

वो दिलावर जो सियह शब के शिकारी निकले

मोहसिन नक़वी

उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर

मोहसिन नक़वी

उजड़ उजड़ के सँवरती है तेरे हिज्र की शाम

मोहसिन नक़वी

तिरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है

मोहसिन नक़वी

सारे लहजे तिरे बे-ज़माँ एक मैं

मोहसिन नक़वी

साँसों के इस हुनर को न आसाँ ख़याल कर

मोहसिन नक़वी

क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच

मोहसिन नक़वी

फिर वही मैं हूँ वही शहर-बदर सन्नाटा

मोहसिन नक़वी

नया है शहर नए आसरे तलाश करूँ

मोहसिन नक़वी

मा'रका अब के हुआ भी तो फिर ऐसा होगा

मोहसिन नक़वी

मैं कल तन्हा था ख़िल्क़त सो रही थी

मोहसिन नक़वी

मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा

मोहसिन नक़वी

मैं चुप रहा कि ज़हर यही मुझ को रास था

मोहसिन नक़वी

लबों पे हर्फ़-ए-रजज़ है ज़िरह उतार के भी

मोहसिन नक़वी

किस ने संग-ए-ख़ामुशी फेंका भरे-बाज़ार पर

मोहसिन नक़वी

ख़ुमार-ए-मौसम-ए-ख़ुश्बू हद-ए-चमन में खुला

मोहसिन नक़वी

ख़ुद अपने दिल में ख़राशें उतारना होंगी

मोहसिन नक़वी

कठिन तन्हाइयों से कौन खेला मैं अकेला

मोहसिन नक़वी

कठिन तन्हाइयाँ से कौन खेला मैं अकेला

मोहसिन नक़वी

जुगनू गुहर चराग़ उजाले तो दे गया

मोहसिन नक़वी

जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ

मोहसिन नक़वी