Ghazal Poetry (page 498)
इश्क़ में लज़्ज़त-ए-आज़ार निकल आती है
मुईद रशीदी
फ़सील-ए-शहर से क्यूँ सब के सब निकल आए
मुईद रशीदी
एक हंगामा शब-ओ-रोज़ बपा रहता है
मुईद रशीदी
दिल ये कहता है हार कर देखें
मुईद रशीदी
दरून-ए-ज़ात हुजूम-ए-अज़ाब ठहरा है
मुईद रशीदी
अपने अंदर के अंधेरे को जलाया मैं ने
मुईद रशीदी
आसार-ए-जुनूँ बे-सर-ओ-सामाँ नहीं होते
मुईद रशीदी
आँखों में शब उतर गई ख़्वाबों का सिलसिला रहा
मुईद रशीदी
आज कुछ सूरत-ए-अफ़्लाक जुदा लगती है
मुईद रशीदी
ज़माने भर की ज़िल्लत सामने थी
मोहसिन ज़ैदी
यूँ समझ लो कि ब-जुज़ नाम-ए-ख़ुदा कुछ न रहा
मोहसिन ज़ैदी
ये जौर अहल-ए-अज़ा पर मज़ीद करते रहे
मोहसिन ज़ैदी
ये हैं जो आस्तीन में ख़ंजर कहाँ से आए
मोहसिन ज़ैदी
वो मौत का मंज़र जो था दिन रात वही है
मोहसिन ज़ैदी
ठहरे हुए न बहते हुए पानियों में हूँ
मोहसिन ज़ैदी
रस्ते में कोई आ के इनाँ-गीर हो न जाए
मोहसिन ज़ैदी
नक़्श पानी पे बनाया क्यूँ था
मोहसिन ज़ैदी
मंज़िल-ओ-सम्त-ए-सफ़र से बे-ख़बर ना-आश्ना
मोहसिन ज़ैदी
क्या देखते हो राह में रुक कर यहाँ वहाँ
मोहसिन ज़ैदी
कोई कश्ती में तन्हा जा रहा है
मोहसिन ज़ैदी
कोई दीवार न दर जानते हैं
मोहसिन ज़ैदी
किसी के दोश न मरकब से इस्तिफ़ादा किया
मोहसिन ज़ैदी
जितना तहज़ीब-ए-बदन से मैं सँवरता जाऊँ
मोहसिन ज़ैदी
जाना है उसी सम्त कि चारा नहीं कोई
मोहसिन ज़ैदी
इस तरफ़ से उस तरफ़ तक ख़ुश्क ओ तर पानी में है
मोहसिन ज़ैदी
हर रोज़ नया हश्र सर-ए-राहगुज़र था
मोहसिन ज़ैदी
हमें तो ख़ैर कोई दूसरा अच्छा नहीं लगता
मोहसिन ज़ैदी
इक आस तो है कोई सहारा नहीं तो क्या
मोहसिन ज़ैदी
दूर तक सब्ज़ा कहीं है और न कोई साएबाँ
मोहसिन ज़ैदी
दोश-ए-हवा पे तिनकों का ये आशियाना क्या
मोहसिन ज़ैदी