Ghazal Poetry (page 500)
जब हिज्र के शहर में धूप उतरी मैं जाग पड़ा तो ख़्वाब हुआ
मोहसिन नक़वी
इतनी मुद्दत बा'द मिले हो
मोहसिन नक़वी
हम जो पहुँचे सर-ए-मक़्तल तो ये मंज़र देखा
मोहसिन नक़वी
हवा-ए-हिज्र में जो कुछ था अब के ख़ाक हुआ
मोहसिन नक़वी
हर एक शब यूँही देखेंगी सू-ए-दर आँखें
मोहसिन नक़वी
ग़ज़लों की धनक ओढ़ मिरे शोला-बदन तू
मोहसिन नक़वी
फ़ज़ा का हब्स शगूफ़ों को बास क्या देगा
मोहसिन नक़वी
एक पल में ज़िंदगी भर की उदासी दे गया
मोहसिन नक़वी
बिछड़ के मुझ से ये मश्ग़ला इख़्तियार करना
मोहसिन नक़वी
भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें
मोहसिन नक़वी
ब-नाम-ए-ताक़त कोई इशारा नहीं चलेगा
मोहसिन नक़वी
अज़ाब-ए-दीद में आँखें लहू लहू कर के
मोहसिन नक़वी
अश्क अपना कि तुम्हारा नहीं देखा जाता
मोहसिन नक़वी
अजीब ख़ौफ़ मुसल्लत था कल हवेली पर
मोहसिन नक़वी
अगरचे मैं इक चटान सा आदमी रहा हूँ
मोहसिन नक़वी
अब ये सोचूँ तो भँवर ज़ेहन में पड़ जाते हैं
मोहसिन नक़वी
अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा
मोहसिन नक़वी
अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
मोहसिन नक़वी
आप की आँख से गहरा है मिरी रूह का ज़ख़्म
मोहसिन नक़वी
तमाम मरहला-ए-फ़र्द-ओ-ज़ात होना है
मोहसिन जलगांवी
घर से निकल भी आएँ मगर यार भी तो हो
मोहसिन जलगांवी
बिसात-ए-ज़ात पथराई तो जाना
मोहसिन जलगांवी
ज़लज़लों ने किया यूँ शहर को मिस्मार कि बस
मोहसिन एहसान
तीरगी है सहन में ताबिंदगी दीवार पर
मोहसिन एहसान
थिरकती लौ की बस इक आख़िरी दुआ सुनता
मोहसिन एहसान
तमाशा इस बरस ऐसा हुआ है
मोहसिन एहसान
तअ'ल्लुक़ात का इक ये भी शाख़साना हुआ
मोहसिन एहसान
सूफ़ी-ए-शहर मिरे हक़ में दुआ क्या करता
मोहसिन एहसान
शाख़-ए-मिज़्गान-ए-मोहब्बत पे सजा ले मुझ को
मोहसिन एहसान
शहर का शहर लुटेरा है नज़र में रखिए
मोहसिन एहसान