Ghazal Poetry (page 502)
गुम इस क़दर हुए आईना-ए-जमाल में हम
मोहसिन एहसान
फ़क़त काग़ज़ पे लिखा बार-ए-अज़ीयत उतरा
मोहसिन एहसान
इक तलातुम सा है हर सम्त तमन्नाओं का
मोहसिन एहसान
दुरुश्त क्यूँ था वो इतना कलाम से पहले
मोहसिन एहसान
दुखों के दश्त ग़मों के नगर में छोड़ आए
मोहसिन एहसान
देखा उसे दिल-गीर तो दिल-गीर हुआ मैं
मोहसिन एहसान
दस्तकें सुनते हैं सब दर खोलता कोई नहीं
मोहसिन एहसान
छुपे हुए थे जो दिल में वो डर पुराने थे
मोहसिन एहसान
चार जानिब से सदा आई मिरी
मोहसिन एहसान
बुझा के रख दे ये कोशिश बहुत हवा की थी
मोहसिन एहसान
बज़्म में वो सरफ़राज़ी की अलामत ले गए
मोहसिन एहसान
बहते हुए लम्हों की कहानी ही बदल दे
मोहसिन एहसान
असीर-ए-हल्का-ए-ज़ंजीर-ए-जाँ हुआ है ये दिल
मोहसिन एहसान
अक़्ल कहती है कोई ढूँड मफ़र की सूरत
मोहसिन एहसान
अपने अंदर से जो बाहर निकले
मोहसिन एहसान
आँख तिश्ना भी नहीं होंट सवाली भी नहीं
मोहसिन एहसान
तिरे फ़िराक़ में दिल से निकाल कर दुनिया
मोहसिन चंगेज़ी
क़याम में भी किसी राह पर रवाना था
मोहसिन चंगेज़ी
कूफ़ा-ए-शब ने जो ताबीर की हद जारी की
मोहसिन चंगेज़ी
आँखें खुलीं कि वा दर-ए-जिंदान हो गया
मोहसिन चंगेज़ी
ज़ाविया कोई मुक़र्रर नहीं होने पाता
मोहसिन भोपाली
ज़ख़्म-ख़ुर्दा तो उसी का था सिपर क्या लेता
मोहसिन भोपाली
यूँही तो शाख़ से पत्ते गिरा नहीं करते
मोहसिन भोपाली
ये तय हुआ है कि क़ातिल को भी दुआ दीजे
मोहसिन भोपाली
ये मेरे चारों तरफ़ किस लिए उजाला है
मोहसिन भोपाली
वो बर्ग-ए-ख़ुश्क था और दामन-ए-बहार में था
मोहसिन भोपाली
वक़्त के तक़ाज़ों को इस तरह भी समझा कर
मोहसिन भोपाली
तू कभी ख़ुद को बे-ख़बर तो कर
मोहसिन भोपाली
ता-देर हम ब-दीदा-ए-तर देखते रहे
मोहसिन भोपाली
सरों की फ़स्ल काटी जा रही है
मोहसिन भोपाली