Ghazal Poetry (page 503)
सहमे सहमे चलते फिरते लाशे जैसे लोग
मोहसिन भोपाली
रात भर जीने से क्या शम-ए-शबिस्ताँ की तरह
मोहसिन भोपाली
निगार-ए-सुब्ह-ए-दरख़्शाँ से लौ लगाए हुए
मोहसिन भोपाली
नज़र मिला के ज़रा देख मत झुका आँखें
मोहसिन भोपाली
मैं लफ़्ज़ों के असर का मो'जिज़ा हूँ
मोहसिन भोपाली
लफ़्ज़ तो हों लब-ए-गुफ़्तार न रहने पाए
मोहसिन भोपाली
क्या ज़रूरी है अब ये बताना मिरा
मोहसिन भोपाली
ख़बर क्या थी न मिलने के नए अस्बाब कर देगा
मोहसिन भोपाली
जिस का दर्द बटाओगे
मोहसिन भोपाली
जाम-ए-तही क़ुबूल न था ग़म समो लिए
मोहसिन भोपाली
जाहिल को अगर जेहल का इनआ'म दिया जाए
मोहसिन भोपाली
हक़ाएक़ को भुलाना चाहते हैं
मोहसिन भोपाली
है वज्ह-ए-तमाशा-ए-जहाँ दिल-शिकनी भी
मोहसिन भोपाली
एहतिमाम-ए-रसन-ओ-दार से किया होता है
मोहसिन भोपाली
दोस्तो बारगह-ए-क़त्ल सजाते जाओ
मोहसिन भोपाली
चाहत में क्या दुनिया-दारी इश्क़ में कैसी मजबूरी
मोहसिन भोपाली
बिछड़ के तुझ से मयस्सर हुए विसाल के दिन
मोहसिन भोपाली
बे-सबब लोग बदलते नहीं मस्कन अपना
मोहसिन भोपाली
बे-ख़बर सा था मगर सब की ख़बर रखता था
मोहसिन भोपाली
बना-ए-इश्क़ है बस उस्तुवार करने तक
मोहसिन भोपाली
अज़्मत-ए-फ़न के परस्तार हैं हम
मोहसिन भोपाली
अपना आप तमाशा कर के देखूँगा
मोहसिन भोपाली
अभी कुछ और भी गर्द-ओ-ग़ुबार उभरेगा
मोहसिन भोपाली
वो है आग वो पानी है
मोहसिन असरार
तेरे ग़म का तदारुक किया तो हमें शर्म आ जाएगी और मर जाएँगे
मोहसिन असरार
सताता वो अगर फ़ितरत से हट के
मोहसिन असरार
सर उठाया इश्क़ ने तो चोट इक भारी पड़ी
मोहसिन असरार
समाअ'तों के लिए राज़ छोड़ आए हैं
मोहसिन असरार
सैलाबों के बा'द हम ऐसे दीवाने हो जाते हैं
मोहसिन असरार
मुझे मलाल भी उस की तरफ़ से होता है
मोहसिन असरार