Ghazal Poetry (page 504)

मिट्टी हो कर इश्क़ किया है इक दरिया की रवानी से

मोहसिन असरार

मिरे बारे में कुछ सोचो मुझे नींद आ रही है

मोहसिन असरार

ख़्वाब को सूरत-ए-हालात बना जाता है

मोहसिन असरार

ख़ुद ही तस्लीम भी करता हूँ ख़ताएँ अपनी

मोहसिन असरार

ख़याल-ओ-ख़्वाब को पाबंद-ए-ख़ू-ए-यार रखा

मोहसिन असरार

ख़ौफ़-ज़दा लोगों से रस्म-ओ-राह बढ़ाते फिरते हैं

मोहसिन असरार

कार-ए-आसान को दुश्वार बना जाता है

मोहसिन असरार

कल रात वो झगड़ती रही बात बात पर

मोहसिन असरार

जब वाहिमे आवाज़ की बुनियाद से निकले

मोहसिन असरार

जानाँ गए दिनों का तअ'ल्लुक़ बहाल कर

मोहसिन असरार

जान जाए अगर तो जाने दे

मोहसिन असरार

हम खड़े हैं हाथ यूँ बाँधे हुए

मोहसिन असरार

हम अपने ज़ेहन पर पहले उसे तारी करेंगे

मोहसिन असरार

हर नए साल नया पेड़ लगा देता हूँ

मोहसिन असरार

गुज़र चुका है ज़माना विसाल करने का

मोहसिन असरार

दूरियों में क़राबतों का मज़ा

मोहसिन असरार

दिलासा दे वगर्ना आँख को गिर्या पकड़ लेगा

मोहसिन असरार

देर से सो कर उठने वालो तड़पो लेकिन शोर न हो

मोहसिन असरार

चराग़-ए-राहगुज़र है जला रहेगा वो

मोहसिन असरार

अच्छा है वो बीमार जो अच्छा नहीं होता

मोहसिन असरार

नज़र को भाए जो मंज़र पहन के निकला है

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

मुद्दत से जो बंद पड़ा था आज वो कमरा खोल दिया

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

कुछ नया काम नए तौर से करने के लिए

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

जिस्म में ख़ूँ की रवानी का मज़ा आएगा

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

जिस तरह धूप का रंगत पे असर पड़ता है

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

हमारे दिल में यादों को सलीक़े से रखा जाए

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

अपना हर इक उसूल मुझे हारना पड़ा

मुहीत इस्माईल

तअ'ल्लुक़ात की दुनिया का हाल क्या कहिए

मोहन सिंह ओबेरॉय दीवाना

मोहब्बत ग़ज़ल है इबादत ग़ज़ल है

मोहन सिंह ओबेरॉय दीवाना

दिल तो पक्का था मगर दिल की दलीलें कच्ची

मोहन सीरत अजमेरी