Ghazal Poetry (page 496)
ग़ुस्सा बेगाना-वार होना था
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
एजाज़-ए-जाँ-दही है हमारे कलाम को
मोमिन ख़ाँ मोमिन
दिल-बस्तगी सी है किसी ज़ुल्फ़-ए-दोता के साथ
मोमिन ख़ाँ मोमिन
दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहा
मोमिन ख़ाँ मोमिन
दीदा-ए-हैराँ ने तमाशा किया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
डर तो मुझे किस का है कि मैं कुछ नहीं कहता
मोमिन ख़ाँ मोमिन
दफ़्न जब ख़ाक में हम सोख़्ता-सामाँ होंगे
मोमिन ख़ाँ मोमिन
चल परे हट मुझे न दिखला मुँह
मोमिन ख़ाँ मोमिन
असर उस को ज़रा नहीं होता
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ऐ आरज़ू-ए-क़त्ल ज़रा दिल को थामना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
अगर ग़फ़लत से बाज़ आया जफ़ा की
मोमिन ख़ाँ मोमिन
अदम में रहते तो शाद रहते उसे भी फ़िक्र-ए-सितम न होता
मोमिन ख़ाँ मोमिन
आँखों से हया टपके है अंदाज़ तो देखो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
कार-ए-अफ़्ज़ाइश-ए-अनवार-ए-सहर किस ने किया
मुईन ताबिश
नए जज़ीरों की हम को भी चाहतें थीं बहुत
मुईन शादाब
बस इक नज़र में दिल-ओ-जाँ फ़िगार करता है
मुईन शादाब
सवाल उस से हमारा कहाँ निबाह का है
मोईन निज़ामी
शाख़ तिनके को लिखा शोले को झोंका लिख दिया
मुईन नजमी
नौहागर से न किसी आईना-ख़ाने से हुई
मुईन नजमी
वही कसीफ़ घटाएँ वही भयानक रात
मुईन अहसन जज़्बी
उदासियों के सिवा दिल की ज़िंदगी क्या है
मुईन अहसन जज़्बी
तुझ से नज़र मिला कर दीवाना हो गया मैं
मुईन अहसन जज़्बी
तुझी से दाद-ए-वहशत लें तुझी को मेहरबाँ कर लें
मुईन अहसन जज़्बी
शिकवा ज़बान से न कभी आश्ना हुआ
मुईन अहसन जज़्बी
शरीक-ए-महफ़िल-ए-दार-ओ-रसन कुछ और भी हैं
मुईन अहसन जज़्बी
शमीम-ए-ज़ुल्फ़ ओ गुल-ए-तर नहीं तो कुछ भी नहीं
मुईन अहसन जज़्बी
सर्व-ओ-समन भी मौज-ए-नसीम-ए-सहर भी है
मुईन अहसन जज़्बी
फिर इशरत-ए-साहिल याद आई फिर शोरिश-ए-तूफ़ाँ भूल गए
मुईन अहसन जज़्बी
न कोई आह न कोई ख़लिश न दर्द न ग़म
मुईन अहसन जज़्बी