Ghazal Poetry (page 494)
मौज-ए-ख़ूँ जोश में थी अपने क़दम से पहले
मूसा रज़ा
ख़ुदा करे तो किसी राज़ का अमीं न बने
मूसा रज़ा
कभी वो दोस्त कभी फ़ित्ना-साज़ लगता है
मूसा रज़ा
कभी हुदूद से बाहर कभी वो हद में रहा
मूसा रज़ा
अपनी नज़र में आप को रुस्वा न कर सके
मूसा रज़ा
तुझे देखा मिरी आँखों में जब शादाबियाँ आईं
मोनिका सिंह
तेरे आने की ख़बर देती रही पागल हवा
मोनिका सिंह
महफ़िलों में ज़िक्र उस का जब छिड़ा मेरे लिए
मोनिका सिंह
कोई आँसू बहाने आ गया शायद
मोनिका सिंह
किसी से राज़-ए-दिल कहना ये ख़ू रुस्वा कराती है
मोनिका सिंह
धड़कनों की बस ज़बानी दे मुझे
मोनिका सिंह
आख़िरी साँसों तलक लड़ती रही
मोनिका सिंह
ज़ौक़ रखता है फ़िक्रमंद तुझे
मोनी गोपाल तपिश
तोशा-ए-धूप से जिस्मों को तराशे सूरज
मोनी गोपाल तपिश
तेरे पलट आने से दिल को और इक सदमा हुआ
मोनी गोपाल तपिश
सन्नाटों के जंगल में खोई हुई ख़ुशबू थी
मोनी गोपाल तपिश
समेट लो ये प्यार की निशानियाँ समेट लो
मोनी गोपाल तपिश
सच को कहने का हौसला है मुझे
मोनी गोपाल तपिश
रातों में जब सुनी कभी शहनाई देर तक
मोनी गोपाल तपिश
रात कितनी रौशन है कुछ लिखा-पढ़ी कर लें आओ फिर ग़ज़ल कह लें
मोनी गोपाल तपिश
मिरे क़रीब से गुज़रे मुझे सदा भी न दे
मोनी गोपाल तपिश
मन के आँगन में ख़यालों का गुज़र कैसा है
मोनी गोपाल तपिश
खिड़कियाँ सब बंद कमरों और दालानों के बीच
मोनी गोपाल तपिश
काश इक़रार कर लिया होता
मोनी गोपाल तपिश
जुनूँ गर बढ़ गया रुस्वाइयाँ बर्बाद कर देंगी
मोनी गोपाल तपिश
गर्द-आलूदा फ़ज़ा बीनाई गर्द-आलूद थी
मोनी गोपाल तपिश
आईने टूटते हैं नज़र को रसाई दे
मोनी गोपाल तपिश
ये उज़्र-ए-इम्तिहान-ए-जज़्ब-ए-दिल कैसा निकल आया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
वो कहाँ साथ सुलाते हैं मुझे
मोमिन ख़ाँ मोमिन
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन