Ghazal Poetry (page 492)
इंकार की लज़्ज़त से न इक़रार-ए-जुनूँ से
मुबश्शिर सईद
हालत-ए-हाल मैं क्या रो के सुनाऊँ तुझ को
मुबश्शिर सईद
गिर्या-ज़ारी भी करूँ शोर मचाऊँ मैं भी
मुबश्शिर सईद
आलम-ए-वज्द से इक़रार में आता हुआ मैं
मुबश्शिर सईद
मैं वो इक जिंस-ए-गिराँ हूँ सर-ए-बाज़ार कि बस
मुबारक शमीम
ख़िज़ाँ में सूख गया मैं तो ये मुक़द्दर था
मुबारक शमीम
कम-निगही का शिकवा कैसा अपने या बेगाने से
मुबारक शमीम
हसरतो अब फिर वही तक़रीब होना चाहिए
मुबारक शमीम
अपने हाथों की लकीरें न मिटा रहने दे
मुबारक शमीम
मैं शजर हूँ अपने साए का सिला लेता नहीं
मुबारक हैदर
यूँ ये बदली काली काली जाएगी
मुबारक अज़ीमाबादी
यहाँ क्या है वहाँ क्या है इधर क्या है उधर क्या है
मुबारक अज़ीमाबादी
या दूर मिरा हिजाब कर दे
मुबारक अज़ीमाबादी
तुम्हारी शर्त-ए-मोहब्बत कभी वफ़ा न हुई
मुबारक अज़ीमाबादी
तुम वक़्त पे कर जाते हो पैमान फ़रामोश
मुबारक अज़ीमाबादी
ताज़ा आज़ार का अरमान कहाँ जाता है
मुबारक अज़ीमाबादी
तमाशाई तो हैं तमाशा नहीं है
मुबारक अज़ीमाबादी
सितम करो न करो इख़्तियार बाक़ी है
मुबारक अज़ीमाबादी
समझाएँ किस तरह दिल-ए-ना-कर्दा-कार को
मुबारक अज़ीमाबादी
पूछी तक़्सीर तो बोले कोई तक़्सीर नहीं
मुबारक अज़ीमाबादी
फिर मिले हम उन से फिर यारी बढ़ी
मुबारक अज़ीमाबादी
पर्दे पर्दे में बहुत मुझ पे तिरे वार चले
मुबारक अज़ीमाबादी
नावक कहें सिनाँ कहें तलवार क्या कहें
मुबारक अज़ीमाबादी
न लाए ताब-ए-दीद औसान वाले
मुबारक अज़ीमाबादी
मोहब्बत में ठनी अक्सर यहाँ तक
मुबारक अज़ीमाबादी
मेरे सर से क्या ग़रज़ सरकार को
मुबारक अज़ीमाबादी
ले चला फिर मुझे दिल यार-ए-दिल-आज़ार के पास
मुबारक अज़ीमाबादी
लगा दे सोज़-ए-मोहब्बत फिर आग सीने में
मुबारक अज़ीमाबादी
क्यूँ किया करते हैं आहें कोई हम से पूछे
मुबारक अज़ीमाबादी
कहते हैं कि दे मेरी बला दाद किसी की
मुबारक अज़ीमाबादी