Ghazal Poetry (page 485)
रंग अल्फ़ाज़ का अल्फ़ाज़ से गहरा चाहूँ
मुमताज़ राशिद
पाया कोई शजर न कोई आसरा लगा
मुमताज़ राशिद
न फ़ासलों में ख़लिश न राहत है क़ुर्बतों में
मुमताज़ राशिद
कुछ तो मुश्किल में काम आते हैं
मुमताज़ राशिद
ख़ून-ए-एहसास को मौजों की रवानी समझे
मुमताज़ राशिद
खो न जाए कहीं हर ख़्वाब सदाओं की तरह
मुमताज़ राशिद
फ़ज़ा में बिखरे हुए रंग झिलमिलाते क्या
मुमताज़ राशिद
दिल के जलते हुए ज़ख़्मों का मुदावा बन कर
मुमताज़ राशिद
तुझे कैसे इल्म न हो सका बड़ी दूर तक ये ख़बर गई
मुमताज़ नसीम
मिरी ज़िंदगी की किताब का है वरक़ वरक़ यूँ सजा हुआ
मुमताज़ नसीम
जिसे मैं ने सुब्ह समझ लिया कहीं ये भी शाम-ए-अलम न हो
मुमताज़ नसीम
चलते चलते ये हालत हुई राह में बिन पिए मय-कशी का मज़ा आ गया
मुमताज़ नसीम
ज़माना गुज़रा है तूफ़ान-ए-ग़म उठाए हुए
मुमताज़ मीरज़ा
ये वफ़ा माँगे है तुम से न जफ़ा माँगे है
मुमताज़ मीरज़ा
तिरे क़रीब भी दिल कुछ बुझा सा रहता है
मुमताज़ मीरज़ा
रंग कुछ शोख़ से तस्वीर में भर कर देखो
मुमताज़ मीरज़ा
फूल जब कोई बिखरता है तो हँस देते हैं
मुमताज़ मीरज़ा
पर्दा-ए-ज़ेहन से साया सा गुज़र जाता है
मुमताज़ मीरज़ा
पलकों पे कुछ चराग़ फ़रोज़ाँ हुए तो हैं
मुमताज़ मीरज़ा
मिरे नालों में इतना तो असर है
मुमताज़ मीरज़ा
मस्लक-ए-इश्क़ बयाँ क्या कीजे
मुमताज़ मीरज़ा
लाई बहार शौक़ के सामाँ नए नए
मुमताज़ मीरज़ा
हर दर्द के हर ग़म के तलबगार हमीं हैं
मुमताज़ मीरज़ा
हमारा राज़-दाँ कोई नहीं है
मुमताज़ मीरज़ा
हाल न पूछो रोज़-ओ-शब का कोई अनोखी बात नहीं
मुमताज़ मीरज़ा
ग़मों में डूबी हुई है हर इक ख़ुशी मेरी
मुमताज़ मीरज़ा
बे-तरह आप की यादों ने सताया है मुझे
मुमताज़ मीरज़ा
बहुत दावे किए हैं आगही ने
मुमताज़ मीरज़ा
तुम को हम दिल में बसा लेंगे तुम आओ तो सही
मुमताज़ मज़ी
ये और बात शजर सर-निगूँ पड़ा हुआ था
मुमताज़ गुर्मानी