Ghazal Poetry (page 90)

जी में आता है कि चल कर जंगलों में जा रहें

ताज सईद

बंद दरीचों के कमरे से पूर्वा यूँ टकराई है

ताज सईद

ये जो कुछ आज है कल तो नहीं है

ताज भोपाली

शुऊ'र-ए-तिश्नगी को आम कर दो

ताज भोपाली

दिल तेरी नज़र की शह पा कर मिलने के बहाने ढूँढे है

ताज भोपाली

ये लोग करते हैं मंसूब जो बयाँ तुझ से

तैमूर हसन

वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता

तैमूर हसन

वो जो मुमकिन न हो मुमकिन ये बना देता है

तैमूर हसन

वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई

तैमूर हसन

उतार लफ़्ज़ों का इक ज़ख़ीरा ग़ज़ल को ताज़ा ख़याल दे दे

तैमूर हसन

तुम कोई इस से तवक़्क़ो' न लगाना मरे दोस्त

तैमूर हसन

नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँगा

तैमूर हसन

मुझ को कहानियाँ न सुना शहर को बचा

तैमूर हसन

मोती नहीं हूँ रेत का ज़र्रा तो मैं भी हूँ

तैमूर हसन

मिरा बातिन मुझे हर पल नई दुनिया दिखाता है

तैमूर हसन

मकाँ से होगा कभी ला-मकान से होगा

तैमूर हसन

मैं ने बख़्श दी तिरी क्यूँ ख़ता तुझे इल्म है

तैमूर हसन

हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं

तैमूर हसन

हिज्र बख़्शा कभी विसाल दिया

तैमूर हसन

एक मंज़िल है एक जादा है

तैमूर हसन

बहाऊँगा न मैं आँसू न मुस्कराउँगा

तैमूर हसन

बहार आने की उम्मीद के ख़ुमार में था

तैमूर हसन

ये एक बात समझने में रात हो गई है

तहज़ीब हाफ़ी

तू ने क्या क़िंदील जला दी शहज़ादी

तहज़ीब हाफ़ी

सहरा से आने वाली हवाओं में रेत है

तहज़ीब हाफ़ी

पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा

तहज़ीब हाफ़ी

न नींद और न ख़्वाबों से आँख भरनी है

तहज़ीब हाफ़ी

कुछ ज़रूरत से कम किया गया है

तहज़ीब हाफ़ी

किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है

तहज़ीब हाफ़ी

जब उस की तस्वीर बनाया करता था

तहज़ीब हाफ़ी