Ghazal Poetry (page 88)

सारी दुनिया के सितम और मिरा दिल तन्हा

तमन्ना जमाली

मैं दयार-ए-क़ातिलाँ का एक तन्हा अजनबी

तालिब जोहरी

जिहत को बे-जिहती के हुनर ने छीन लिया

तालिब जोहरी

जैसे ही ज़ीना बोला तह-ख़ाने का

तालिब जोहरी

धूप जब तक सर पे थी ज़ेर-ए-क़दम पाए गए

तालिब जोहरी

शराब शहर में नीलाम हो गई होगी

तालिब हुसैन तालिब

माल-ओ-ज़र की क़द्र क्या ख़ून-ए-जिगर के सामने

तालिब हुसैन तालिब

ख़िश्त-ए-जाँ दरमियान लाने में

तालिब हुसैन तालिब

ग़म-ए-जहाँ में ग़म-ए-यार ज़म न कर पाया

तालिब हुसैन तालिब

भेज कर शहर हारती है मुझे

तालिब हुसैन तालिब

मुझ को दिमाग़-ए-गर्मी-ए-बाज़ार है कहाँ

तालिब चकवाली

मेरा आईना मिरी शक्ल दिखाता है मुझे

तालिब चकवाली

ख़्वाब और हक़ीक़त की तस्वीर नज़र आई

तालिब चकवाली

ख़िज़ाँ ब-रंग-ए-बहाराँ है देखिए क्या हो

तालिब चकवाली

ग़म-ए-दिल की ज़बाँ अहल-ए-तशद्दुद कम समझते हैं

तालिब चकवाली

बेज़ार ज़िंदगी से दिल-ए-मुज़्महिल नहीं

तालिब चकवाली

बे-कैफ़ मसर्रत भी मुसीबत सी लगे है

तालिब चकवाली

यूँ भी तिरा एहसान है आने के लिए आ

तालिब बाग़पती

ये कार-ए-बे-समर है अगर कर लिया तो क्या

तालिब अंसारी

रौनक़ें आबादियाँ क्या क्या चमन की याद हैं

तालिब अली खान ऐशी

न पहुँचा साथ यारान-ए-सफ़र की ना-तवानी से

तालिब अली खान ऐशी

कट गई उम्र यही एक तमन्ना करते

तल्हा रिज़वी बारक़

इश्क़ क्यूँ रुस्वा हुआ अपना सर-ए-राहे गाहे

तल्हा रिज़वी बारक़

दर्द-ए-दिल को दास्ताँ-दर-दास्ताँ होने तो दो

तल्हा रिज़वी बारक़

यूँ भी तो तिरी राह की दीवार नहीं हैं

तालीफ़ हैदर

ये शहर अपनी इसी हाव-हू से ज़िंदा है

तालीफ़ हैदर

तमाम शहर ही तेरी अदा से क़ाएम है

तालीफ़ हैदर

सवाल क्या है जवाब क्या है

तालीफ़ हैदर

फिर क़िस्सा-ए-शब लिख देने के ये दिल हालात बनाए है

तालीफ़ हैदर

नज़ारगी-ए-शौक़ ने दीदार में खींचा

तालीफ़ हैदर