Ghazal Poetry (page 89)

नई ज़मीनों को अर्ज़-ए-गुमाँ बनाते हैं

तालीफ़ हैदर

न बे-कली का हुनर है न जाँ-फ़ज़ाई का

तालीफ़ हैदर

हम जब्र-ए-मोहब्बत से गुरेज़ाँ नहीं होते

तालीफ़ हैदर

हम हिज्र के रस्तों की हवा देख रहे हैं

तालीफ़ हैदर

दर्द-आमेज़ है कुछ यूँ मिरी ख़ामोशी भी

तालीफ़ हैदर

बस एक शय मिरे अंदर तमाम होती हुई

तालीफ़ हैदर

बहुत मुश्किल था मुझ को राह का हमवार कर देना

तालीफ़ हैदर

आहिस्ता-रवी शहर को काहिल न बना दे

तालीफ़ हैदर

जुनूँ ने ज़हर का पियाला पिया आहिस्ता आहिस्ता

तलअत इशारत

हर रस्म पर नज़र को झुकाते हुए चले

तलअत इशारत

बेगानगी में यूँही गुज़ारा करेंगे हम

तलअत इशारत

मिरे ख़याल का साया जहाँ पड़ा होगा

तख़्त सिंह

हर अश्क तिरी याद का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है

तख़्त सिंह

एक एक क़तरा उस का शो'ला-फ़िशाँ सा है

तख़्त सिंह

दूर तक परछाइयाँ सी हैं रह-ए-अफ़्कार पर

तख़्त सिंह

मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए

ताजवर नजीबाबादी

हुस्न-ए-शोख़-चश्म में नाम को वफ़ा नहीं

ताजवर नजीबाबादी

हश्र में फिर वही नक़्शा नज़र आता है मुझे

ताजवर नजीबाबादी

ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं

ताजवर नजीबाबादी

ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज

ताजवर नजीबाबादी

ज़ख़्म कब का था दर्द उठा है अब

ताजदार आदिल

तिलिस्म-ए-इश्क़ था सब उस का साथ होने तक

ताजदार आदिल

सावन-रुत और उड़ती पुर्वा तेरे नाम

ताजदार आदिल

लब तक आया गिला हमेशा से

ताजदार आदिल

जो मिल गया है यहाँ जल्वा-ए-ख़याली है

ताजदार आदिल

शिकवा न हो तसलसुल-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ रहे

तजम्मुल हुसैन अख़्तर

शहर के दीवार-ओ-दर पर रुत की ज़र्दी छाई थी

ताज सईद

किस ने आ कर हम को दी आवाज़ पिछली रात में

ताज सईद

खिड़की में एक नार जो महव-ए-ख़याल है

ताज सईद

काली घटा में चाँद ने चेहरा छुपा लिया

ताज सईद