Ghazal Poetry (page 91)

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं

तहज़ीब हाफ़ी

इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझे

तहज़ीब हाफ़ी

इक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ

तहज़ीब हाफ़ी

चेहरा देखें तेरे होंट और पलकें देखें

तहज़ीब हाफ़ी

बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता

तहज़ीब हाफ़ी

अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी

तहज़ीब हाफ़ी

तिरी गली में गए कितने माह ओ साल हुए

तहसीन फ़िराक़ी

मुझ सा अंजान किसी मोड़ पे खो सकता है

तहसीन फ़िराक़ी

मह-ओ-अंजुम ने क़बा की तो तुम्हारे लिए की

तहसीन फ़िराक़ी

इसे मैं और ये मेरा असा ही तय करेगा

तहसीन फ़िराक़ी

चमन इतना ख़िज़ाँ-आसार पहले कब हुआ था

तहसीन फ़िराक़ी

बहुत से सैल-ए-हवादिस की ज़द पे बह गए हैं

तहसीन फ़िराक़ी

ये आँख नम थी ज़बाँ पर मगर सवाल न था

ताहिरा जबीन तारा

ख़्वाब डसते रहे बिखरते रहे

ताहिरा जबीन तारा

काग़ज़ पे तेरा नक़्श उतारा नहीं गया

ताहिरा जबीन तारा

तो तय हुआ ना कि जब भी लिखना रुतों के सारे अज़ाब लिखना

ताहिर तोनस्वी

वक़्त करता है ख़ुद-कुशी मुझ में

ताहिर फ़राज़

सुकून-ए-दिल में वो बन के जब इंतिशार उतरा तो मैं ने देखा

ताहिर फ़राज़

मिरी मंज़िलें कहीं और हैं मिरा रास्ता कोई और है

ताहिर फ़राज़

मिरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो

ताहिर फ़राज़

में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे

ताहिर फ़राज़

कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा

ताहिर फ़राज़

कहीं ख़ुलूस की ख़ुशबू मिले तो रुक जाऊँ

ताहिर फ़राज़

जो शजर बे-लिबास रहते हैं

ताहिर फ़राज़

जिस ने तेरी याद में सज्दे किए थे ख़ाक पर

ताहिर फ़राज़

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी

ताहिर फ़राज़

गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी

ताहिर फ़राज़

ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया

ताहिर फ़राज़

दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही

ताहिर फ़राज़

अजीब हम हैं सबब के बग़ैर चाहते हैं

ताहिर फ़राज़