Ghazal Poetry (page 92)

अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुइ

ताहिर फ़राज़

आप हमारे साथ नहीं

ताहिर फ़राज़

ये जो शीशा है दिल-नुमा मुझ में

ताहिर अज़ीम

मुझ को भी हक़ है ज़िंदगानी का

ताहिर अज़ीम

मौसम-ए-गुल बहार के दिन थे

ताहिर अज़ीम

मैं उस की मोहब्बत से इक दिन भी मुकर जाता

ताहिर अज़ीम

ख़्वाहिशों की बादशाही कुछ नहीं

ताहिर अज़ीम

हर दर्द की दवा भी ज़रूरी नहीं कि हो

ताहिर अज़ीम

इक वहशत सी दर आई है आँखों में

ताहिर अज़ीम

इक अनोखी रस्म को ज़िंदा रखा है

ताहिर अज़ीम

बढ़ रहा हूँ ख़याल से आगे

ताहिर अज़ीम

मुझे वो छोड़ कर जब से गया है इंतिहा है

ताहिर अदीम

हर एक रस्ता-ए-पायाब से निकलना है

ताहिर अदीम

बुझ रही है आँख ये जिस्म है जुमूद में

ताहिर अदीम

आँखों में है कैसा पानी बंद है क्यूँ आवाज़

ताहिर अदीम

वही बे-लिबास क्यारियाँ कहीं बेल बूटों के बल नहीं

तफ़ज़ील अहमद

तन्हा कर के मुझ को सलीब-ए-सवाल पे छोड़ दिया

तफ़ज़ील अहमद

सितम-ज़रीफ़ी की सूरत निकल ही आती है

तफ़ज़ील अहमद

शहर को चोट पे रखती है गजर में कोई चीज़

तफ़ज़ील अहमद

पहाड़ों को बिछा देते कहीं खाई नहीं मिलती

तफ़ज़ील अहमद

मिला किसी से न अच्छा लगा सुख़न इस बार

तफ़ज़ील अहमद

मेहवर पे भी गर्दिश मिरी मेहवर से अलग हो

तफ़ज़ील अहमद

लहरों में भँवर निकलेंगे मेहवर न मिलेगा

तफ़ज़ील अहमद

लब-ए-मंतिक़ रहे कोई न चश्म-लन-तरानी हो

तफ़ज़ील अहमद

ख़ामोश भी रह जाए और इज़हार भी कर दे

तफ़ज़ील अहमद

घने अरमान गाढ़ी आरज़ू करने से मिलता है

तफ़ज़ील अहमद

इक परेशानी अलग थी और पशेमानी अलग

तफ़ज़ील अहमद

अव्वल वही सैराब था सानी भी वही था

तफ़ज़ील अहमद

मिट गए हाए मकीं और मकान-ए-देहली

तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ख़ान कौकब देहलवी

हर अदा तुंद और नबात उस की

ताबिश सिद्दीक़ी