Ghazal Poetry (page 94)
देखिए अहल-ए-मोहब्बत हमें क्या देते हैं
ताबिश देहलवी
बंद-ए-ग़म मुश्किल से मुश्किल-तर खुला
ताबिश देहलवी
बहुत जबीन-ओ-रुख़-ओ-लब बहुत क़द-ओ-गेसू
ताबिश देहलवी
अज़ाब टूटे दिलों को हर इक नफ़स गुज़रा
ताबिश देहलवी
आग़ाज़-ए-गुल है शौक़ मगर तेज़ अभी से है
ताबिश देहलवी
मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़रती है गुज़र जाने दो
तबस्सुम रिज़वी
अश्कों के गुहर यूँ सर-ए-मिज़्गाँ भी न तोलें
तबस्सुम रिज़वी
ज़िंदगी दिल पे अजब सेहर सा करती जाए
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
ये हुजुम-ए-रस्म-ओ-रह दुनिया की पाबंदी भी है
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
वो रौशनी कि ब-क़ैद-ए-सहर नहीं ऐ दोस्त
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
वो नाज़ुक सा तबस्सुम रह गया वहम-ए-हसीं बन कर
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
तुम्हीं बताओ पुकारा है बार बार किसे
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
तुम्हीं बताओ पुकारा है बार बार किसे
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
सवाद-ए-ग़म में कहीं गोशा-ए-अमाँ न मिला
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
शौक़ के ख़्वाब-ए-परेशाँ की हैं तफ़्सीरें बहुत
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
शौक़ का तक़ाज़ा है शरह-ए-आरज़ू कीजे
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
शरह-ए-जाँ-सोज़-ए-ग़म-ए-अर्ज़-ए-वफ़ा क्या करते
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
सर-ता-ब-क़दम एक हसीं राज़ का आलम
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
रहगुज़र हो या मुसाफ़िर नींद जिस को आए है
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
क़ुसूर इश्क़ में ज़ाहिर है सब हमारा था
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
नुमू के फ़ैज़ से रंग-ए-चमन निखर सा गया
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
मिलेगा दर्द तो दरमाँ की आरज़ू होगी
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
मिरी सहबा-परस्ती मोरीद-ए-इल्ज़ाम है साक़ी
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
मंज़िलों से बेगाना आज भी सफ़र मेरा
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
लुत्फ़ ये है जिसे आशोब-ए-जहाँ कहता हूँ
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
लुत्फ़ का रब्त है कोई न जफ़ा का रिश्ता
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
लाई तिरी महफ़िल में मुझे आरज़ू-ए-दीद
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
किसी के हाथ में जाम-ए-शराब आया है
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
कमाल-ए-बे-ख़बरी को ख़बर समझते हैं
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ