Ghazal Poetry (page 95)
जुनूँ ख़ुद-नुमा ख़ुद-निगर भी नहीं
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
जुनूँ ख़ुद-नुमा ख़ुद-नगर भी नहीं
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
जल्वा पाबंद-ए-नज़र भी है नज़र-साज़ भी है
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
हम एक उम्र जले शम-ए-रहगुज़र की तरह
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
हम एक उम्र जले शम-ए-रहगुज़र की तरह
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
हुजूम-ए-दर्द का इतना बढ़े असर गुम हो
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
हर सितम लुत्फ़ है दिल ख़ूगर-ए-आज़ार कहाँ
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
हर मोड़ को चराग़-ए-सर-ए-रहगुज़र कहो
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
गुलों के साथ अजल के पयाम भी आए
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
एक तुम ही नहीं दुनिया में जफ़ाकार बहुत
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
दिल वो काफ़िर कि सदा ऐश का सामाँ माँगे
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
दौर-ए-तूफ़ाँ में भी जी लेते हैं जीने वाले
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
दाद भी फ़ित्ना-ए-बेदाद भी क़ातिल की तरफ़
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
छटे ग़ुबार-ए-नज़र बाम-ए-तूर आ जाए
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
छटे ग़ुबार नज़र बाम-ए-तूर आ जाए
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
भूले तो जैसे रब्त कोई दरमियाँ न था
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
बस्ती में कमी किस चीज़ की है पत्थर भी बहुत शीशे भी बहुत
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
बहार आई गुल-अफ़्शानियों के दिन आए
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
यार से अब के गर मिलूँ 'ताबाँ'
ताबाँ अब्दुल हई
यार रूठा है मिरा उस को मनाऊँ किस तरह
ताबाँ अब्दुल हई
याँ तलक के है तिरे हिज्र में फ़रियाद कि बस
ताबाँ अब्दुल हई
तुम्हारे हिज्र में रहता है हम को ग़म मियाँ-साहिब
ताबाँ अब्दुल हई
तुम से अब कामयाब और ही है
ताबाँ अब्दुल हई
तू मिल उस से हो जिस से दिल तिरा ख़ुश
ताबाँ अब्दुल हई
तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है
ताबाँ अब्दुल हई
तेरी मख़मूर चश्म ऐ मय-नोश
ताबाँ अब्दुल हई
तेरी आँखें बड़ी सी प्यारी हैं
ताबाँ अब्दुल हई
तिरे मिज़्गाँ की फ़ौजें बाँध कर सफ़ जब हुईं ख़ड़ियाँ
ताबाँ अब्दुल हई
सुन फ़स्ल-ए-गुल ख़ुशी हो गुलशन में आइयाँ हैं
ताबाँ अब्दुल हई
शब को फिरे वो रश्क-ए-माह ख़ाना-ब-ख़ाना कू-ब-कू
ताबाँ अब्दुल हई