Ghazal Poetry (page 96)
साक़ी हो और चमन हो मीना हो और हम हों
ताबाँ अब्दुल हई
रोया न हूँ जहाँ में गरेबाँ को अपने फाड़
ताबाँ अब्दुल हई
क़फ़स से छूटने की कब हवस है
ताबाँ अब्दुल हई
नमकीं हर्फ़ है मिरा ये फ़सीह
ताबाँ अब्दुल हई
नहीं तुम मानते मेरा कहा जी
ताबाँ अब्दुल हई
नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहरबाँ अपना
ताबाँ अब्दुल हई
न मिरे पास इज़्ज़त-ए-रमज़ाँ
ताबाँ अब्दुल हई
मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं है
ताबाँ अब्दुल हई
मिरा ख़ुर्शीद-रू सब माह-रूयाँ बीच यक्का है
ताबाँ अब्दुल हई
मरने की मुझ को आप से हैं इज़तिराबियाँ
ताबाँ अब्दुल हई
मैं हो के तिरे ग़म से नाशाद बहुत रोया
ताबाँ अब्दुल हई
लड़का जो ख़ूब-रू है सो मुझ से बचा नहीं
ताबाँ अब्दुल हई
क्या करें क्यूँ-कर रहें दुनिया में यारो हम ख़ुशी
ताबाँ अब्दुल हई
किसी का काम दिल इस चर्ख़ से हुआ भी है
ताबाँ अब्दुल हई
किसी गुल में नहीं पाने की तू बू-ए-वफ़ा हरगिज़
ताबाँ अब्दुल हई
किस से पूछूँ हाए मैं इस दिल के समझाने की तरह
ताबाँ अब्दुल हई
ख़ूब-रू जो एक का महबूब नहीं
ताबाँ अब्दुल हई
ख़ूबाँ जो पहनते हैं निपट तंग चोलियाँ
ताबाँ अब्दुल हई
खोता ही नहीं है हवस-ए-मतअम-ओ-मलबस
ताबाँ अब्दुल हई
कई दिन हो गए या-रब नहीं देखा है यार अपना
ताबाँ अब्दुल हई
काबा है अगर शैख़ का मस्जूद-ए-ख़लाइक़
ताबाँ अब्दुल हई
इन ज़ालिमों को जौर सिवा काम ही नहीं
ताबाँ अब्दुल हई
हुए हैं जा के आशिक़ अब तो हम उस शोख़ चंचल के
ताबाँ अब्दुल हई
हो रूह के तईं जिस्म से किस तरह मोहब्बत
ताबाँ अब्दुल हई
है आरज़ू ये जी में उस की गली में जावें
ताबाँ अब्दुल हई
ग़म में रोता हूँ तिरे सुब्ह कहीं शाम कहीं
ताबाँ अब्दुल हई
ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान है आज
ताबाँ अब्दुल हई
एक ही जाम को पिला साक़ी
ताबाँ अब्दुल हई
दिलबर से दर्द-ए-दिल न कहूँ हाए कब तलक
ताबाँ अब्दुल हई
देख उस को ख़्वाब में जब आँख खुल जाती है सुब्ह
ताबाँ अब्दुल हई