Ghazal Poetry (page 97)

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ

ताबाँ अब्दुल हई

अज़ीज़ाँ सितमगर न आया मिरे घर

ताबाँ अब्दुल हई

ऐश सब ख़ुश आते हैं जब तलक जवानी है

ताबाँ अब्दुल हई

ऐसा कहाँ हुबाब कोई चश्म-ए-तर कि हम

ताबाँ अब्दुल हई

ऐ मर्द-ए-ख़ुदा हो तू परस्तार बुताँ का

ताबाँ अब्दुल हई

आरज़ू है मैं रखूँ तेरे क़दम पर गर जबीं

ताबाँ अब्दुल हई

आई बहार शोरिश-तिफ़लाँ को क्या हुआ

ताबाँ अब्दुल हई

मंज़िलों उस को आवाज़ देते रहे मंज़िलों जिस की कोई ख़बर भी न थी

ताब असलम

कोई भी नक़्श सलामत नहीं है चेहरे का

ताब असलम

दिल के सहरा में बड़े ज़ोर का बादल बरसा

ताब असलम

याद-ए-अय्याम कि हम-रुतबा-ए-रिज़वाँ हम थे

तअशशुक़ लखनवी

उन्स है ख़ाना-ए-सय्याद से गुलशन कैसा

तअशशुक़ लखनवी

ता-सहर की है फ़ुग़ाँ जान के ग़ाफ़िल मुझ को

तअशशुक़ लखनवी

सू-ए-दयार ख़ंदा-ज़न वो यार-ए-जानी फिर गया

तअशशुक़ लखनवी

न डरे बर्क़ से दिल की है कड़ी मेरी आँख

तअशशुक़ लखनवी

मुँह जो फ़ुर्क़त में ज़र्द रहता है

तअशशुक़ लखनवी

महफ़िल से उठाने के सज़ा-वार हमीं थे

तअशशुक़ लखनवी

कब अपनी ख़ुशी से वो आए हुए हैं

तअशशुक़ लखनवी

जोश पर थीं सिफ़त-ए-अब्र-ए-बहारी आँखें

तअशशुक़ लखनवी

दो दमों से है फ़क़त गोर-ए-ग़रीबाँ आबाद

तअशशुक़ लखनवी

दिल जल के रह गए ज़क़न-ए-रश्क-ए-माह पर

तअशशुक़ लखनवी

बाग़ में फूलों को रौंद आई सवारी आप की

तअशशुक़ लखनवी

अपनी फ़रहत के दिन ऐ यार चले आते हैं

तअशशुक़ लखनवी

दुखों की वादी में हर शाम का गुज़र ऐसे

सय्यदा ज़िया ख़ालिदा

यूँ तो इख़्लास में इस के कोई धोका भी नहीं

सय्यदा शान-ए-मेराज

क्या देखता है हाल के मंज़र इधर भी देख

सय्यदा शान-ए-मेराज

कभी कभी तिरी चाहत पे ये गुमाँ गुज़रा

सय्यदा शान-ए-मेराज

जो तिरी महफ़िल से ज़ौक़-ए-ख़ाम ले कर आए हैं

सय्यदा शान-ए-मेराज

हिज्र में तेरे तसव्वुर का सहारा है बहुत

सय्यदा शान-ए-मेराज

हाल मौसम का ही पूछेगा वो जब पूछेगा

सय्यदा शान-ए-मेराज