Ghazal Poetry (page 99)
गा रहा हूँ ख़ामुशी में दर्द के नग़्मात मैं
सय्यद ज़मीर जाफ़री
दर्द में लज़्ज़त बहुत अश्कों में रा'नाई बहुत
सय्यद ज़मीर जाफ़री
बड़ी हैरत से अरबाब-ए-वफ़ा को देखता हूँ मैं
सय्यद ज़मीर जाफ़री
अपनी ख़बर नहीं है ब-जुज़ इस क़दर मुझे
सय्यद ज़मीर जाफ़री
अपनी ख़बर नहीं है ब-जुज़ ईं क़दर मुझे
सय्यद ज़मीर जाफ़री
अपने ज़र्फ़ अपनी तलब अपनी नज़र की बात है
सय्यद ज़मीर जाफ़री
अगर हम दश्त-ए-जुनूँ में न ग़ज़ल-ख़्वाँ होते
सय्यद ज़मीर जाफ़री
वो जब आप से अपना पर्दा करें
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
वही गुल है गुलिस्ताँ में वही है शम्अ' महफ़िल में
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
थी आसमाँ पे मेरी चढ़ाई तमाम रात
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
तेरे दर से मैं उठा लेकिन न मेरा दिल उठा
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
रोने की ये शिद्दत है कि घबरा गईं आँखें
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
क़ाज़ी के मुँह पे मारी है बोतल शराब की
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
मोहताज नहीं क़ाफ़िला आवाज़-ए-दरा का
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
मिल जाएँ अज़दहाम में हम ही ये हम से दूर
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
मैं ने कहा कि दा'वा-ए-उलफ़त मगर ग़लत
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ले के अपनी ज़ुल्फ़ को वो प्यारे प्यारे हाथ में
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
कलाम-ए-सख़्त कह कह कर वो क्या हम पर बरसते हैं
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
कहाँ है तू कहाँ है और मैं हूँ
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
कभी ख़ूँ होती हुए और कभी जलते देखा
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
जब कहो क्यूँ हो ख़फ़ा क्या बाइ'स
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
जाँ-फ़िशानी का वाँ हिसाब अबस
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
इस तवक़्क़ो' पे कि देखूँ कभी आते जाते
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
हम ने सौ सौ तरह बनाई बात
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
हम उन की नज़र में समाने लगे
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
हम को हवस-ए-जल्वा-गाह-ए-तूर नहीं है
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
है आईना-ख़ाने में तिरा ज़ौक़-फ़ज़ा रक़्स
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
दिल में उतरी है निगह रह गईं बाहर पलकें
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
बे-दिए ले उड़ा कबूतर ख़त
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
बर-सर-ए-लुत्फ़ आज चश्म-ए-दिल-रुबा थी मैं न था
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम