Ghazal Poetry (page 93)

इक उम्र हुई और मैं अपने से जुदा हूँ

ताबिश सिद्दीक़ी

यादों की क़िंदील जलाना कितना अच्छा लगता है

ताबिश मेहदी

ख़ता मैं ने कोई भारी नहीं की

ताबिश मेहदी

जहान-ए-दिल में सन्नाटा बहुत है

ताबिश मेहदी

दश्त-ए-तन्हाई बादल हवा और मैं

ताबिश मेहदी

बला से मर्तबे ऊँचे न रखना

ताबिश मेहदी

तेरी सूरत निगाहों में फिरती रहे इश्क़ तेरा सताए तो मैं क्या करूँ

ताबिश कानपुरी

ये शहर आफ़तों से तो ख़ाली कोई न था

ताबिश कमाल

यक़ीं से जो गुमाँ का फ़ासला है

ताबिश कमाल

न देखें तो सुकूँ मिलता नहीं है

ताबिश कमाल

क्या कहूँ वो किधर नहीं रहता

ताबिश कमाल

कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है

ताबिश कमाल

हमारा डूबना मुश्किल नहीं था

ताबिश कमाल

अजीब सुब्ह थी दीवार ओ दर कुछ और से थे

ताबिश कमाल

अजब यक़ीन सा उस शख़्स के गुमान में था

ताबिश कमाल

ज़ेर-ए-लब रहा नाला दर्द की दवा हो कर

ताबिश देहलवी

यूँ नक़ाब-ए-रुख़ मुक़ाबिल से उठी

ताबिश देहलवी

टूट कर अहद-ए-तमन्ना की तरह

ताबिश देहलवी

टूट कर अहद-ए-तमन्ना की तरह

ताबिश देहलवी

'ताबिश' हवस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ तक

ताबिश देहलवी

शर्मिंदा हम जुनूँ से हैं एक एक तार के

ताबिश देहलवी

सब ग़म कहें जिसे कि तमन्ना कहें जिसे

ताबिश देहलवी

पाबंदी-ए-हुदूद से बेगाना चाहिए

ताबिश देहलवी

नफ़स की ज़द पे हर इक शोला-ए-तमन्ना है

ताबिश देहलवी

मंज़िलों को नज़र में रक्खा है

ताबिश देहलवी

मह-ओ-पर्वीं तह-ए-कमंद रहे

ताबिश देहलवी

हर इक दाग़-ए-दिल शम्अ' साँ देखता हूँ

ताबिश देहलवी

हमा-तन गोश इक ज़माना था

ताबिश देहलवी

एक जल्वा ब-सद अंदाज़-ए-नज़र देख लिया

ताबिश देहलवी

धूमें मचाएँ सब्ज़ा रौंदें फूलों को पामाल करें

ताबिश देहलवी