Bewafa Poetry (page 28)

दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को

अर्श सिद्दीक़ी

अज़ाब-ए-बे-दिली-ए-जान-ए-मुब्तला न गया

अर्श सिद्दीक़ी

आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था

अर्श सिद्दीक़ी

ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था

अर्श सहबाई

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी

अर्श मलसियानी

तह-ए-अफ़्लाक ही सब कुछ नहीं है

अरमान नज्मी

घर से चीख़ें उठ रही थीं और मैं जागा न था

आरिफ़ शफ़ीक़

गिला होंटों पे लाए जा रहा हूँ

आरिफ़ इशतियाक़

ज़ख़्म सब उस को दिखा कर रक़्स कर

आरिफ़ इमाम

हम भी नादाँ हैं समझते हैं कि छट जाएगी

आरिफ़ अब्दुल मतीन

बजा कि कश्ती है पारा पारा थपेड़े तूफ़ाँ के खा रहा हूँ

आरिफ़ अब्दुल मतीन

चश्म-ए-मुश्ताक़ तमाशा-ए-करम चाहे है

आरिफ़ अब्बासी

बाइ'स-ए-अर्ज़-ए-हुनर कर्ब-ए-निहानी निकला

अक़ील शादाब

फ़ितरत का ये सितम भी है 'दानिश' अजीब चीज़

अक़ील दानिश

कितने सवाल सब की निगाहों में रख दिए

अक़ील दानिश

हुस्न हर रंग में मख़्सूस कशिश रखता है

अनवापुल हसन अनवार

भूलने वाले तुझे याद किया है बरसों

अनवापुल हसन अनवार

खींच कर तलवार जब तर्क-ए-सितमगर रह गया

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

कहाँ मुमकिन है पोशीदा ग़म-ए-दिल का असर होना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

मेरी नज़र के लिए कोई रिवायत न थी

अनवर सिद्दीक़ी

क्या बे-मुरव्वती का शिकवा गिला किसी से

अनवर शऊर

वो पर्दे से निकल कर सामने जब बे-हिजाब आया

अनवर सहारनपुरी

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

अनवर सहारनपुरी

हासिल-ए-ग़म यही समझते हैं

अनवर साबरी

अता-ए-ग़म पे भी ख़ुश हूँ मिरी ख़ुशी क्या है

अनवर साबरी

वादा-ए-शाम-ए-फ़र्दा पे ऐ दिल मुझे गर यक़ीं ही न आए तो मैं क्या करूँ

अनवर मिर्ज़ापुरी

मैं जुर्म-ए-ख़मोशी की सफ़ाई नहीं देता

अनवर मसूद

बे-घर था फिर छोड़ गया घर जाने क्यूँ

अनवर जमाल अनवर

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

अनवर देहलवी