ख्वाब Poetry (page 32)
कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है
ग़ालिब
कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में
ग़ालिब
कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
ग़ालिब
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी
ग़ालिब
जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
ग़ालिब
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
ग़ालिब
जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआअ'
ग़ालिब
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
ग़ालिब
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
ग़ालिब
हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है
ग़ालिब
हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं
ग़ालिब
हुजूम-ए-नाला हैरत आजिज़-ए-अर्ज़-ए-यक-अफ़्ग़ँ है
ग़ालिब
हुजूम-ए-ग़म से याँ तक सर-निगूनी मुझ को हासिल है
ग़ालिब
हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो
ग़ालिब
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
ग़ालिब
है सब्ज़ा-ज़ार हर दर-ओ-दीवार-ए-ग़म-कदा
ग़ालिब
है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल
ग़ालिब
है आरमीदगी में निकोहिश बजा मुझे
ग़ालिब
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
ग़ालिब
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ
ग़ालिब
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
ग़ालिब
ग़ाफ़िल ब-वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
ग़ालिब
गर्म-ए-फ़रियाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे
ग़ालिब
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए
ग़ालिब
दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई
ग़ालिब
दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया
ग़ालिब
धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
ग़ालिब