ख्वाब Poetry (page 31)
गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार
ग़ालिब
दिल से मिटना तिरी अंगुश्त-ए-हिनाई का ख़याल
ग़ालिब
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब
ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है
ग़ालिब
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
ग़ालिब
वो आ के ख़्वाब में तस्कीन-ए-इज़्तिराब तो दे
ग़ालिब
वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँ न हो
ग़ालिब
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
ग़ालिब
सुर्मा-ए-मुफ़्त-ए-नज़र हूँ मिरी क़ीमत ये है
ग़ालिब
सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर
ग़ालिब
शब कि बर्क़-ए-सोज़-ए-दिल से ज़हरा-ए-अब्र आब था
ग़ालिब
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
ग़ालिब
रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी-ए-शमा
ग़ालिब
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
ग़ालिब
फिर हुआ वक़्त कि हो बाल-कुशा मौज-ए-शराब
ग़ालिब
पा-ब-दामन हो रहा हूँ बस-कि मैं सहरा-नवर्द
ग़ालिब
नक़्श-ए-नाज़-ए-बुत-ए-तन्नाज़ ब-आग़ोश-ए-रक़ीब
ग़ालिब
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
ग़ालिब
न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सब्ज़ा-ए-ख़त से
ग़ालिब
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
ग़ालिब
मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
ग़ालिब
मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है
ग़ालिब
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
ग़ालिब
मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
ग़ालिब
मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
ग़ालिब
लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
ग़ालिब
लताफ़त बे-कसाफ़त जल्वा पैदा कर नहीं सकती
ग़ालिब
लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का
ग़ालिब
लब-ए-ईसा की जुम्बिश करती है गहवारा-जम्बानी
ग़ालिब
क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है
ग़ालिब