ख्वाब Poetry (page 30)
दर्द की कौन सी मंज़िल से गुज़रते होंगे
ग़ज़नफ़र
ज़मीं के साथ फ़लक के सफ़र में हम भी हैं
ग़यास मतीन
ख़्वाब आँखों की गली छोड़ के जाने निकले
ग़यास मतीन
जज़ीरे हों कि वो सहरा हों ख़्वाब होना है
ग़यास मतीन
आँख की पुतली में सूरज सर में कुछ सौदा उगा
ग़यास मतीन
तुझे मैं भूल जाना चाहता हूँ
ग़यास अंजुम
हुजूम-ए-दर्द मिला इम्तिहान ऐसा था
ग़यास अंजुम
दर्द के चाँद की तस्वीर ग़ज़ल में आए
ग़यास अंजुम
बे-नियाज़-ए-बहार सा क्यूँ है
ग़यास अंजुम
न होते शाद आईन-ए-गुलिस्ताँ देखने वाले
ग़ौस मोहम्मद ग़ौसी
उस की सूरत का तसव्वुर दिल में जब लाते हैं हम
ग़मगीन देहलवी
उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी
ग़मगीन देहलवी
मैं ने हर-चंद कि उस कूचे में जाना छोड़ा
ग़मगीन देहलवी
जो न वहम-ओ-गुमान में आवे
ग़मगीन देहलवी
अक्स की कहानी का इक़्तिबास हम ही थे
ग़ालिब इरफ़ान
कभी गुमान कभी ए'तिबार बन के रहा
ग़ालिब अयाज़
जहाँ ख़राब सही हम बदन-दरीदा सही
ग़ालिब अयाज़
दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला
ग़ालिब अयाज़
सदा ब-सहरा
ग़ालिब अहमद
या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो
ग़ालिब
ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर
ग़ालिब
सँभलने दे मुझे ऐ ना-उमीदी क्या क़यामत है
ग़ालिब
जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
ग़ालिब
जल्वे का तेरे वो आलम है कि गर कीजे ख़याल
ग़ालिब
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
ग़ालिब
हवस-ए-गुल के तसव्वुर में भी खटका न रहा
ग़ालिब
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो 'असद'
ग़ालिब
है ख़याल-ए-हुस्न में हुस्न-ए-अमल का सा ख़याल
ग़ालिब
है गै़ब-ए-ग़ैब जिस को समझते हैं हम शुहूद
ग़ालिब
है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल
ग़ालिब