ख्वाब Poetry (page 28)
किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ख़्वाब कहाँ से टूटा है ताबीर से पूछते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ख़ामोश थे तुम और बोलता था बस एक सितारा आँखों में
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जज़्बों को किया ज़ंजीर तो क्या तारों को किया तस्ख़ीर तो क्या
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बयाबाँ दूर तक मैं ने सजाया था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
आँख से बिछड़े काजल को तहरीर बनाने वाले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
न ये है न वो है न मैं हूँ न तू है
ग़ुलाम मौला क़लक़
वही वा'दा है वही आरज़ू वही अपनी उम्र-ए-तमाम है
ग़ुलाम मौला क़लक़
उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं
ग़ुलाम मौला क़लक़
न हो आरज़ू कुछ यही आरज़ू है
ग़ुलाम मौला क़लक़
ऐ सितम-आज़मा जफ़ा कब तक
ग़ुलाम मौला क़लक़
ऐ ख़ार ख़ार-ए-हसरत क्या क्या फ़िगार हैं हम
ग़ुलाम मौला क़लक़
आए क्या तेरा तसव्वुर ध्यान में
ग़ुलाम मौला क़लक़
सितारा-ए-ख़्वाब से भी बढ़ कर ये कौन बे-मेहर है कि जिस ने
ग़ुलाम हुसैन साजिद
रुका हूँ किस के वहम में मिरे गुमान में नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मिरी विरासत में जो भी कुछ है वो सब इसी दहर के लिए है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं रिज़्क़-ए-ख़्वाब हो के भी उसी ख़याल में रहा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं एक मुद्दत से इस जहाँ का असीर हूँ और सोचता हूँ
ग़ुलाम हुसैन साजिद
इस अँधेरे में चराग़-ए-ख़्वाब की ख़्वाहिश नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
उफ़ुक़ से आग उतर आई है मिरे घर भी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
सुब्ह तक जिन से बहुत बेज़ार हो जाता हूँ मैं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
समझते हैं जो अपने बाप की जागीर मिट्टी को
ग़ुलाम हुसैन साजिद
रुका हूँ किस के वहम में मिरे गुमान में नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
क़र्या-ए-हैरत में दिल का मुस्तक़र इक ख़्वाब है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
नहीं है इस नींद के नगर में अभी किसी को दिमाग़ मेरा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
नहीं आसाँ किसी के वास्ते तख़्मीना मेरा
ग़ुलाम हुसैन साजिद