ख्वाब Poetry (page 27)

नज़्म

गोपाल मित्तल

नज़्म

गोपाल मित्तल

कि दर गुफ़्तन नमी आयद

गोपाल मित्तल

मुझ पे तू मेहरबान है प्यारे

गोपाल मित्तल

रह गई लुट कर बहार-ए-ज़िंदगी

गोपाल कृष्णा शफ़क़

तेरे मेरे ख़्वाब जुदा

गिरिजा व्यास

किसी से ख़्वाब का चर्चा न करना

गिरिजा व्यास

आँखों में नए रंग सजाने नहीं उतरे

गिरिजा व्यास

मुझे उस नींद के माथे का बोसा हो इनायत

ग़ज़ाला शाहिद

दिए से लौ नहीं पिंदार ले कर जा रही है

ग़ज़ाला शाहिद

अब जो आज़ाद हुए हैं तो ख़याल आया है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

आता था जिस को देख के तस्वीर का ख़याल

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

ताबीरों से बंद क़बा-ए-ख़्वाब खुले

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

नायाब चीज़ कौन सी बाज़ार में नहीं

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मिरी गिरफ़्त में है ताएर-ए-ख़याल मिरा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मेरे लब तक जो न आई वो दुआ कैसी थी

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

कहीं कहीं से पुर-असरार हो लिया जाए

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बर्क़ का ठीक अगर निशाना हो

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

सोचा है तुम्हारी आँखों से अब मैं उन को मिलवा ही दूँ

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

प्यार गया तो कैसे मिलते रंग से रंग और ख़्वाब से ख़्वाब

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

हज़ारों इस में रहने के लिए आए

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

एक ज़ाती नज़्म

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

ये जहाँ-नवर्द की दास्ताँ ये फ़साना डोलते साए का

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

सोए हुए जज़्बों को जगाना ही नहीं था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

फिर वही कहने लगे तू मिरे घर आया था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

मिलने की हर आस के पीछे अन-देखी मजबूरी थी

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

कुछ बे-तरतीब सितारों को पलकों ने किया तस्ख़ीर तो क्या

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर