ख्वाब Poetry (page 25)
वो देखने मुझे आना तो चाहता होगा
हबीब जालिब
उस रऊनत से वो जीते हैं कि मरना ही नहीं
हबीब जालिब
तिरे माथे पे जब तक बल रहा है
हबीब जालिब
महताब-सिफ़त लोग यहाँ ख़ाक-बसर हैं
हबीब जालिब
कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ
हबीब जालिब
भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
नफ़स नफ़स न कहीं जाए राएगाँ अपना
हबीब राहत हबाब
चाँदनी छुपती है तकयों के तले आँखों में ख़्वाब
हबीब मूसवी
शराब पी जान तन में आई अलम से था दिल कबाब कैसा
हबीब मूसवी
शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है
हबीब मूसवी
शब कि मुतरिब था शराब-ए-नाब थी पैमाना था
हबीब मूसवी
क़त्अ होता रहे इस तरह बयान-ए-वाइज़
हबीब मूसवी
मेहर-ओ-उल्फ़त से मआल-ए-तहज़ीब
हबीब मूसवी
जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा
हबीब मूसवी
हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है
हबीब मूसवी
है निगहबाँ रुख़ का ख़ाल-रू-ए-दोस्त
हबीब मूसवी
है नौ-जवानी में ज़ोफ़-ए-पीरी बदन में रअशा कमर में ख़म है
हबीब मूसवी
फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है
हबीब मूसवी
भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा
हबीब मूसवी
बना के आईना-ए-तसव्वुर जहाँ दिल-ए-दाग़-दार देखा
हबीब मूसवी
अक़्ल पर पत्थर पड़े उल्फ़त में दीवाना हुआ
हबीब मूसवी
गुलों से इतनी भी वाबस्तगी नहीं अच्छी
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
याद जो आए ख़ुद शरमाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने
हबीब आरवी
इस तरह दर्द का तुम अपने मुदावा करना
हबीब आरवी
ख़ुश-नज़र है न ख़ुश-ख़याल है ये
हबाब तिर्मिज़ी
कौन सी मंज़िल है जो बे-ख़्वाब आँखों में नहीं
गुलज़ार वफ़ा चौदरी
तिरी उमीदों का साथ देगी इनायत-ए-बर्ग-ओ-बार कब तक
गुलज़ार बुख़ारी
कितनी सदियाँ ना-रसी की इंतिहा में खो गईं
गुलज़ार बुख़ारी
तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं
गुलज़ार
एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है
गुलज़ार