ख्वाब Poetry (page 29)
मिरी विरासत में जो भी कुछ है वो सब इसी दहर के लिए है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मिरी सुब्ह-ए-ख़्वाब के शहर पर यही इक जवाज़ है जब्र का
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मिरे नज्म-ए-ख़्वाब के रू-ब-रू कोई शय नहीं मिरे ढंग की
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मता-ए-दीद तो क्या जानिए किस से इबारत है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मसाफ़त-ए-उम्र में ज़ियाँ का हिसाब होता है जुस्तुजू से
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं अपने सूरज के साथ ज़िंदा रहूँगा तो ये ख़बर मिलेगी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
लहू की आग अगर जलती रहेगी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
किस ने दी आवाज़ ''सिपर की ओट में था''
ग़ुलाम हुसैन साजिद
ख़ुदा-ए-बर्तर ने आसमाँ को ज़मीन पर मेहरबाँ किया है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
हुआ रौशन दम-ए-ख़ुर्शीद से फिर रंग पानी का
ग़ुलाम हुसैन साजिद
होंटों पर है बात कड़ी ताज़ीरें भी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
चराग़ की ओट में रुका है जो इक हयूला सा यासमीं का
ग़ुलाम हुसैन साजिद
चराग़ की ओट में है मेहराब पर सितारा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
अगर ये रंगीनी-ए-जहाँ का वजूद है अक्स-ए-आसमाँ से
ग़ुलाम हुसैन साजिद
आज आईने में जो कुछ भी नज़र आता है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
आइना-आसा ये ख़्वाब-ए-नीलमीं रक्खूँगा मैं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मेरे पहलू में तुम आओ ये कहाँ मेरे नसीब
ग़ुलाम भीक नैरंग
फिर वही हम हैं ख़याल-ए-रुख़-ए-ज़ेबा है वही
ग़ुलाम भीक नैरंग
कभी सूरत जो मुझे आ के दिखा जाते हो
ग़ुलाम भीक नैरंग
कब से बंजर थी नज़र ख़्वाब तो आया
ग़ुफ़रान अमजद
कब से बंजर थी नज़र ख़्वाब तो आया
ग़ुफ़रान अमजद
तिरा मय-ख़्वार ख़ुश-आग़ाज़-ओ-ख़ुश-अंजाम है साक़ी
ग़ुबार भट्टी
सुख़न का लहजा गुमान-ख़ाने में रह गया है
ग़ज़नफ़र हाशमी
बे-चेहरगी-ए-उम्र-ए-ख़जालत भी बहुत है
ग़ज़नफ़र हाशमी
बैठे हैं ईद को सब यार बग़ल में ले कर
ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र
हम कि साहिल के तसव्वुर से सहम जाते हैं
ग़ज़नफ़र
हमारे हाथ से वो भी निकल गया आख़िर
ग़ज़नफ़र
यक़ीन जानिए इस में कोई करामत है
ग़ज़नफ़र
सजा के ज़ेहन में कितने ही ख़्वाब सोए थे
ग़ज़नफ़र
ख़ला के दश्त से अब रिश्ता अपना क़त्अ करूँ
ग़ज़नफ़र