ख्वाब Poetry (page 34)
ख़ून पलकों पे सर-ए-शाम जमेगा कैसे
फ़ुज़ैल जाफ़री
गुज़र रही है मगर ख़ासे इज़्तिराब के साथ
फ़ुज़ैल जाफ़री
चमकते चाँद से चेहरों के मंज़र से निकल आए
फ़ुज़ैल जाफ़री
तमाम जिस्म की परतें जुदा जुदा करके
फ़िज़ा कौसरी
ज़ौक़-ए-नज़र को जल्वा-ए-बेताब ले गया
फ़ितरत अंसारी
तसव्वुर में जमाल-ए-रू-ए-ताबाँ ले के चलता हूँ
फ़ितरत अंसारी
निगाह-ए-हुस्न की तासीर बन गया शायद
फ़ितरत अंसारी
नए जहाँ में पुरानी शराब ले आए
फ़ितरत अंसारी
बा'द मुद्दत के ख़याल-ए-मय-ओ-मीना आया
फ़ितरत अंसारी
न में यक़ीन में रख्खूँ न तो गुमान में रख
फ़िरदौस गयावी
अब क्या बताऊँ शहर ये कैसा लगा मुझे
फ़िरदौस गयावी
तमाम अजनबी चेहरे सजे हैं चारों तरफ़
फ़िराक़ जलालपुरी
शाम-ए-अयादत
फ़िराक़ गोरखपुरी
परछाइयाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
जुगनू
फ़िराक़ गोरखपुरी
जुदाई
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिण्डोला
फ़िराक़ गोरखपुरी
आधी रात
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये मौत-ओ-अदम कौन-ओ-मकाँ और ही कुछ है
फ़िराक़ गोरखपुरी
सुना तो है कि कभी बे-नियाज़-ए-ग़म थी हयात
फ़िराक़ गोरखपुरी
रस्म-ओ-राह-ए-दहर क्या जोश-ए-मोहब्बत भी तो हो
फ़िराक़ गोरखपुरी
निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या
फ़िराक़ गोरखपुरी
कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है
फ़िराक़ गोरखपुरी
कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में
फ़िराक़ गोरखपुरी
जिसे लोग कहते हैं तीरगी वही शब हिजाब-ए-सहर भी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का पर्दा उठा दिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है
फ़िराक़ गोरखपुरी
अब अक्सर चुप चुप से रहें हैं यूँही कभू लब खोलें हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
तिरे ग़म के सामने कुछ ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं है
फ़िगार उन्नावी