ख्वाब Poetry (page 77)
नफ़स की आमद-ओ-शुद को वबाल कर के भी
आरिफ़ इमाम
फ़सील-ए-ज़ात से बाहर भी देखना है मुझे
आरिफ़ इमाम
ज़हराब-ए-तिश्नगी का मज़ा हम से पूछिए
आरिफ़ अंसारी
कभी ख़याल के रिश्तों को भी टटोल के देख
आरिफ़ अब्दुल मतीन
ज़मीं से ता-ब-फ़लक कोई फ़ासला भी नहीं
आरिफ़ अब्दुल मतीन
वो कारवान-ए-बहाराँ कि बे-दरा होगा
आरिफ़ अब्दुल मतीन
किसी परिंदे ने उड़ने का मन बनाया है
आराधना प्रसाद
लिबास गर्द का और जिस्म नूर का निकला
अक़ील शादाब
हवस का रंग चढ़ा उस पे और उतर भी गया
अक़ील शादाब
बराए-नाम सही कोई मेहरबान तो है
अक़ील शादाब
बाइ'स-ए-अर्ज़-ए-हुनर कर्ब-ए-निहानी निकला
अक़ील शादाब
असर मिरी ज़बान में नहीं रहा
अक़ील शादाब
सुकून-ए-दिल न मयस्सर हुआ ज़माने में
अनवापुल हसन अनवार
अब तिरे हिज्र में यूँ उम्र बसर होती है
अनवापुल हसन अनवार
हुजूम शोला में था हल्क़ा-ए-शरर में था
अनवर सिद्दीक़ी
डुबोए देता है ख़ुद-आगही का बार मुझे
अनवर सिद्दीक़ी
हम बुलाते वो तशरीफ़ लाते रहे
अनवर शऊर
उन से तन्हाई में बात होती रही
अनवर शऊर
पियो कि मा-हसल-ए-होश किस ने देखा है
अनवर शऊर
मिरी हयात है बस रात के अँधेरे तक
अनवर शऊर
मैं बज़्म-ए-तसव्वुर में उसे लाए हुए था
अनवर शऊर
इस में क्या शक है कि आवारा हूँ मैं
अनवर शऊर
फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था
अनवर शऊर
बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है
अनवर शऊर
बशारत हो कि अब मुझ सा कोई पागल न आएगा
अनवर शऊर
और न दर-ब-दर फिरा और न आज़मा मुझे
अनवर शऊर
ऐसे देखा है कि देखा ही न हो
अनवर शऊर
अगरचे आइना-ए-दिल में है क़याम उस का
अनवर शऊर
पागलों की मद्ह में
अनवर सेन रॉय
ख़्वाबों को समझौते रास नहीं आते
अनवर सेन रॉय