ख्वाब Poetry (page 76)

लकीर-ए-संग को अन्क़ा-मिसाल हम ने किया

अरशद अब्दुल हमीद

ग़ज़ल में जान पड़ी गुफ़्तुगू में फूल खिले

अरशद अब्दुल हमीद

फ़सील-ए-सब्र में रौज़न बनाना चाहती है

अरशद अब्दुल हमीद

हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए

अर्श सिद्दीक़ी

ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था

अर्श सहबाई

मैं हूँ ऐसे बिखरा सा

अर्श सहबाई

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

दीवाली

अर्श मलसियानी

तरब के मख़मसे ग़म के झमेले

अर्श मलसियानी

अगर तक़दीर तेरी बाइस-ए-आज़ार हो जाए

अर्श मलसियानी

'अरमाँ' बस एक लज़्ज़त-ए-इज़हार के सिवा

अरमान नज्मी

हिना-रंग हाथों में

अरमान नज्मी

पिछली रफ़ाक़तों का न इतना मलाल कर

अरमान नज्मी

निगाह-ए-तिश्ना से हैरत का बाब देखते हैं

अरमान नज्मी

कभी तो आ के मिलो मेरा हाल तो पूछो

अरमान नज्मी

घनी आबादियों की बे-अमानी का तमाशा कर

अरमान नज्मी

तलाश

आरिफ़ा शहज़ाद

अंधे अदम वजूद के गिर्दाब से निकल

आरिफ़ शफ़ीक़

जब भी दुश्मन बन के इस ने वार किया

आरिफ़ शफ़ीक़

हमें नज़दीक कब दिल की मोहब्बत खींच लाती है

आरिफ़ शफ़ीक़

दोज़ख़ भी क्या गुमान है जन्नत भी है फ़रेब

आरिफ़ शफ़ीक़

अंधे अदम वजूद के गिर्दाब से निकल

आरिफ़ शफ़ीक़

तुम्हें प्यार है, तो यक़ीन दो,

आरिफ़ इशतियाक़

उम्र-भर का हुआ ज़ियाँ जानाँ

आरिफ़ इशतियाक़

गिला तिरे फ़िराक़ का जो आज-कल नहीं रहा

आरिफ़ इशतियाक़

दिया जलाएगी तू और मैं बुझाऊँगा

आरिफ़ इशतियाक़

हवस न जान तुझे छू के देखना ये है

आरिफ़ इमाम

सुबू में अक्स-ए-रुख़-ए-माहताब देखते हैं

आरिफ़ इमाम

शायरी मुझ को अजब हाल में ले जाती है

आरिफ़ इमाम

सब लहू जम गया उबाल के बीच

आरिफ़ इमाम