ख्वाब Poetry (page 93)
क़सम इन आँखों की जिन से लहू टपकता है
अख़्तर अंसारी
मेरे रुख़ से सुकूँ टपकता है
अख़्तर अंसारी
लुत्फ़ ले ले के पिए हैं क़दह-ए-ग़म क्या क्या
अख़्तर अंसारी
कोई मआल-ए-मोहब्बत मुझे बताओ नहीं
अख़्तर अंसारी
दिन मुरादों के ऐश की रातें
अख़्तर अंसारी
चर्ख़ की सई-ए-जफ़ा कोशिश नाकारा है
अख़्तर अंसारी
आईना-ए-निगाह में अक्स-ए-शबाब है
अख़्तर अंसारी
कभी जो आँखों में पल-भर को ख़्वाब जागते हैं
अख़लाक़ बन्दवी
मक़्तल
अख़लाक़ अहमद आहन
मुलाहिज़ा हो मिरी भी उड़ान पिंजरे में
अखिलेश तिवारी
किसे जाना कहाँ है मुनहसिर होता है इस पर भी
अखिलेश तिवारी
कभी तो डूब चले हम कभी उभरते हुए
अखिलेश तिवारी
उस ख़ुश-अदा के आइना-ख़ाने में जाऊँगा
अकबर मासूम
सुन! हिज्र और विसाल का जादू कहाँ गया
अकबर मासूम
नींद में गुनगुना रहा हूँ मैं
अकबर मासूम
ख़्वाब आराम नहीं ख़्वाब परेशानी है
अकबर मासूम
ख़ुद से निकलूँ भी तो रस्ता नहीं आसान मिरा
अकबर मासूम
अब भी अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है
अकबर मासूम
हिसार-अंदर-हिसार
अकबर हैदराबादी
ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया
अकबर हैदराबादी
सितम-ज़दा कई बशर क़दम क़दम पे थे
अकबर हैदराबादी
जब सुब्ह की दहलीज़ पे बाज़ार लगेगा
अकबर हैदराबादी
हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था
अकबर हैदराबादी
घुटन अज़ाब-ए-बदन की न मेरी जान में ला
अकबर हैदराबादी
दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से
अकबर हैदराबादी
दहकते कुछ ख़याल हैं अजीब अजीब से
अकबर हैदराबादी
बस इक तसलसुल-ए-तकरार-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी था
अकबर हैदराबादी
तमाम आलम-ए-इम्काँ मिरे गुमान में है
अकबर हमीदी
शरार-ए-संग जो इस शोर-ओ-शर से निकलेगा
अकबर हमीदी
नाम 'अकबर' तो मिरा माँ की दुआ ने रक्खा
अकबर हमीदी