ख्वाब Poetry (page 95)

वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा

ऐतबार साजिद

तुम्हें ख़याल-ए-ज़ात है शुऊर-ए-ज़ात ही नहीं

ऐतबार साजिद

तिरे जैसा मेरा भी हाल था न सुकून था न क़रार था

ऐतबार साजिद

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया

ऐतबार साजिद

न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का

ऐतबार साजिद

मुझे ऐसा लुत्फ़ अता किया कि जो हिज्र था न विसाल था

ऐतबार साजिद

मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है

ऐतबार साजिद

कहा दिन को भी ये घर किस लिए वीरान रहता है

ऐतबार साजिद

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

ऐतबार साजिद

जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

ऐतबार साजिद

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी

ऐतबार साजिद

तू ही इंसाफ़ से कह जिस का ख़फ़ा यार रहे

ऐश देहलवी

कुछ कम नहीं हैं शम्अ से दिल की लगन में हम

ऐश देहलवी

पाँव फँसे में हाथ छुड़ाने आया था

ऐनुद्दीन आज़िम

जो मैं ने कह दिया उस से मुकरने वाला नहीं

ऐनुद्दीन आज़िम

अब जुनूँ के रत-जगे ख़िरद में आ गए

ऐनुद्दीन आज़िम

पहले तो शहर ऐसा न था

ऐन ताबिश

अदम से परे

ऐन ताबिश

आँसुओं के रतजगों से

ऐन ताबिश

क़िस्सा-ए-ख़्वाब हूँ हासिल नहीं कोई मेरा

ऐन ताबिश

ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए

ऐन ताबिश

कैसे अफ़्सूँ थे वहाँ कैसे फ़साने थे उधर

ऐन ताबिश

ग़ुबार-ए-जहाँ में छुपे बा-कमालों की सफ़ देखता हूँ

ऐन ताबिश

बज़्म ख़ाली नहीं मेहमान निकल आते हैं

ऐन ताबिश

न तीरगी के लिए हूँ न रौशनी के लिए

ऐन सलाम

क़ल्ब की बंजर ज़मीं पर ख़्वाहिशें बोते हुए

ऐन इरफ़ान

क्या किसी बात की सज़ा है मुझे

ऐन इरफ़ान

हादसा कौन सा हुआ पहले

ऐन इरफ़ान

इक साया मेरे जैसा है

ऐन इरफ़ान

इक परिंदा शाख़ पर बैठा हुआ

ऐन इरफ़ान