ख्वाब Poetry (page 92)
नश्तर से आरज़ू के दिल-ए-ज़िंदगी फ़िगार
अख़्तर ओरेनवी
ख़याल उसी की तरफ़ बार बार जाता है
अख़्तर नज़्मी
हाँ ये भी तरीक़ा अच्छा है तुम ख़्वाब में मिलते हो मुझ से
अख़तर मुस्लिमी
दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे
अख़तर मुस्लिमी
देखो उस ने क़दम क़दम पर साथ दिया बेगाने का
अख्तर लख़नवी
अब भी आती है तिरी याद प इस कर्ब के साथ
अख़तर इमाम रिज़वी
जुर्म-ए-हस्ती की सज़ा क्यूँ नहीं देते मुझ को
अख़तर इमाम रिज़वी
जो संग हो के मुलाएम है सादगी की तरह
अख़तर इमाम रिज़वी
दिल वो प्यासा है कि दरिया का तमाशा देखे
अख़तर इमाम रिज़वी
विसाल
अख़्तर हुसैन जाफ़री
तर्क-ए-वादा कि तर्क-ए-ख़्वाब था वो
अख़्तर हुसैन जाफ़री
सब ख़याल उस के लिए हैं सब सवाल उस के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
हिज्र इक हुस्न है इस हुस्न में रहना अच्छा
अख़्तर हुसैन जाफ़री
मैं ने जो ख़्वाब अभी देखा नहीं है 'अख़्तर'
अख़्तर होशियारपुरी
वो ज़िंदगी है उस को ख़फ़ा क्या करे कोई
अख़्तर होशियारपुरी
वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था
अख़्तर होशियारपुरी
रुख़्सत-ए-रक़्स भी है पाँव में ज़ंजीर भी है
अख़्तर होशियारपुरी
पहले तो सोच के दोज़ख़ में जलाता है मुझे
अख़्तर होशियारपुरी
मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ
अख़्तर होशियारपुरी
मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ
अख़्तर होशियारपुरी
मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया
अख़्तर होशियारपुरी
मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए
अख़्तर होशियारपुरी
मैं हर्फ़ देखूँ कि रौशनी का निसाब देखूँ
अख़्तर होशियारपुरी
ख़्वाहिशें इतनी बढ़ीं इंसान आधा रह गया
अख़्तर होशियारपुरी
ख़्वाब-महल में कौन सर-ए-शाम आ कर पत्थर मारता है
अख़्तर होशियारपुरी
बजा कि दुश्मन-ए-जाँ शहर-ए-जाँ के बाहर है
अख़्तर होशियारपुरी
अपने क़दमों ही की आवाज़ से चौंका होता
अख़्तर होशियारपुरी
कोई मआल-ए-मोहब्बत मुझे बताओ नहीं
अख़्तर अंसारी
हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था
अख़्तर अंसारी
सदा कुछ ऐसी मिरे गोश-ए-दिल में आती है
अख़्तर अंसारी