ख्वाब Poetry (page 90)
वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता
अख्तर शुमार
सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़
अख्तर शुमार
पड़े थे हम भी जहाँ रौशनी में बिखरे हुए
अख्तर शुमार
उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं
अख़्तर शीरानी
रात भर उन का तसव्वुर दिल को तड़पाता रहा
अख़्तर शीरानी
माना कि सब के सामने मिलने से है हिजाब
अख़्तर शीरानी
ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
अख़्तर शीरानी
अब वो बातें न वो रातें न मुलाक़ातें हैं
अख़्तर शीरानी
वक़्त की क़द्र
अख़्तर शीरानी
ओ देस से आने वाले बता
अख़्तर शीरानी
नन्हा क़ासिद
अख़्तर शीरानी
मुझे ले चल
अख़्तर शीरानी
जहाँ 'रेहाना' रहती थी
अख़्तर शीरानी
एक शाएरा की शादी पर
अख़्तर शीरानी
एक हुस्न-फ़रोश से
अख़्तर शीरानी
दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा आह कर लूँगा
अख़्तर शीरानी
दावत
अख़्तर शीरानी
बस्ती की लड़कियों के नाम
अख़्तर शीरानी
बरखा-रुत
अख़्तर शीरानी
बदनाम हो रहा हूँ
अख़्तर शीरानी
अँगूठी
अख़्तर शीरानी
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
अख़्तर शीरानी
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
अख़्तर शीरानी
ज़मान-ए-हिज्र मिटे दौर-ए-वस्ल-ए-यार आए
अख़्तर शीरानी
यक़ीन-ए-वादा नहीं ताब-ए-इंतिज़ार नहीं
अख़्तर शीरानी
वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें
अख़्तर शीरानी
उन को बुलाएँ और वो न आएँ तो क्या करें
अख़्तर शीरानी
उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं
अख़्तर शीरानी
सू-ए-कलकत्ता जो हम ब-दिल-ए-दीवाना चले
अख़्तर शीरानी
निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर
अख़्तर शीरानी