ख्वाब Poetry (page 88)

जिस दिन से उठ के हम तिरी महफ़िल से आए हैं

अलीम उस्मानी

गर्दिश-ए-मय का इस पर न होगा असर मस्त आँखों का जादू जिसे याद है

अलीम उस्मानी

बा'द मुद्दत के खुला जौहर-ए-नायाब मिरा

अलीम सबा नवेदी

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना

अलीम अख़्तर

तुयूर थे जो घोंसलों में पैकरों के उड़ गए

अलीम अफ़सर

हाथों से मेरे छीन कर दिल का मआल ले गई

अलीम अफ़सर

चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम

अलीम अफ़सर

बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग

अलीम अफ़सर

बन कर लहू यक़ीन न आए तो देख लें

अलीम अफ़सर

बन के ताबीर भी आया होता

आलमताब तिश्ना

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे

आलमताब तिश्ना

हिसार-ए-मक़्तल-ए-जाँ में लहू लहू मैं था

आलमताब तिश्ना

मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई

आलम ख़ुर्शीद

याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द

आलम ख़ुर्शीद

थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं

आलम ख़ुर्शीद

तिरे ख़याल को ज़ंजीर करता रहता हूँ

आलम ख़ुर्शीद

तह-ब-तह है राज़ कोई आब की तहवील में

आलम ख़ुर्शीद

मैं जिधर जाऊँ मिरा ख़्वाब नज़र आता है

आलम ख़ुर्शीद

जाना तो बहुत दूर है महताब से आगे

आलम ख़ुर्शीद

हर घर में कोई तह-ख़ाना होता है

आलम ख़ुर्शीद

बस एक तिरे ख़्वाब से इंकार नहीं है

आलम ख़ुर्शीद

रख्खूँ कहाँ पे पाँव बढ़ाऊँ किधर क़दम

अकरम नक़्क़ाश

बार-हा तू ने ख़्वाब दिखलाए

अकरम नक़्क़ाश

अंधा सफ़र है ज़ीस्त किसे छोड़ दे कहाँ

अकरम नक़्क़ाश

टूटी हुई शबीह की तस्ख़ीर क्या करें

अकरम नक़्क़ाश

मैं नहीं हूँ नहीं कहीं भी नहीं

अकरम नक़्क़ाश

कुछ फ़ासला नहीं है अदू और शिकस्त में

अकरम नक़्क़ाश

गहरी सूनी राह और तन्हा सा मैं

अकरम नक़्क़ाश

ब-रंग-ए-ख़्वाब मैं बिखरा रहूँगा

अकरम नक़्क़ाश