ख्वाब Poetry (page 87)

जुनूँ से राह-ए-ख़िरद में भी काम लेना था

अली जव्वाद ज़ैदी

ग़ैर पूछें भी तो हम क्या अपना अफ़्साना कहें

अली जव्वाद ज़ैदी

विपंस ऑफ़ मास डेस्ट्रक्शन

अली इमरान

तिरे वस्ल पे तेरी क़ुर्बत पे ला'नत

अली इमरान

अब कोई ग़म ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

अली इमरान

नींद आती है मगर जाग रहा हूँ सर-ए-ख़्वाब

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

रंग-ए-महफ़िल से फ़ुज़ूँ-तर मिरी हैरानी है

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

बर-सर-ए-बाद हुआ अपना ठिकाना सर-ए-राह

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

ख़्वाब इक परिंदा है

अली असग़र अब्बास

हरीम-ए-काबा बना दी वो सर-ज़मीं मैं ने

अली अख़्तर अख़्तर

हरीम-ए-का'बा बना दी वो सर-ज़मीं मैं ने

अली अख़्तर अख़्तर

दिल की आरज़ू थी दर्द दर्द-ए-बे-दवा पाया

अली अख़्तर अख़्तर

ज़र्द फूलों में बसा ख़्वाब में रहने वाला

अली अकबर नातिक़

उठेंगे मौत से पहले

अली अकबर नातिक़

सुर्मा हो या तारा

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-3

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-2

अली अकबर नातिक़

ज़र्द फूलों में बसा ख़्वाब में रहने वाला

अली अकबर नातिक़

मैं खोए जाता हूँ तन्हाइयों की वुसअत में

अली अकबर अब्बास

मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ

अली अकबर अब्बास

सारा दिन बे-कार बैठे शाम को घर आ गए

अली अकबर अब्बास

मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ

अली अकबर अब्बास

ग़ुबार-ए-नूर है या कहकशाँ है या कुछ और

अली अकबर अब्बास

अँधेरी शब का ये ख़्वाब-मंज़र मुझे उजालों से भर रहा है

अलीना इतरत

शाम की पुरवाई

अलीना इतरत

नज़्म तकमील

अलीना इतरत

मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है

अलीना इतरत

ये किस मुहिम पर चले थे हम जिस में रास्ते पुर-ख़तर न आए

अलीना इतरत

जुनूँ में दामन-ए-दिल गरचे तार तार हुआ

अलीना इतरत

बगूला बन के नाचता हुआ ये तन गुज़र गया

अलीना इतरत